पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) जहां कभी ऐसे मामलों में “अम्प्यूटेशन” (अंग काटना) ही अंतिम विकल्प माना जाता था, वहीं एम्स पटना ने चिकित्सा विज्ञान, तकनीक और मानवीय संवेदनशीलता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हुए एक 25 वर्षीय युवक का पैर बचाकर इतिहास रच दिया है। यह केवल एक सर्जरी नहीं बल्कि उम्मीद, नवाचार और जीवन की गुणवत्ता को बचाने की कहानी है। उत्तर प्रदेश के देवरिया निवासी मकर ध्वज बीते कई महीनों से अपने बाएं पैर में असहनीय दर्द और सूजन से परेशान थे। मामूली चोट के बाद इसे सामान्य फ्रैक्चर समझकर इलाज किया गया लेकिन दर्द कम होने के बजाय बढ़ता ही चला गया।
जब 13 मई 2025 को वे एम्स पटना पहुंचे तो जांच में सामने आया कि यह एक साधारण फ्रैक्चर नहीं बल्कि टिबिया में पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर है जो किसी गंभीर बीमारी का संकेत था। आगे की जांच ने उस आशंका को सच कर दिया। ईविंग सारकोमा, एक दुर्लभ और अत्यंत आक्रामक बोन कैंसर। एक ऐसा नाम जिसके साथ अक्सर जुड़ा होता है अंग खो देने का डर। इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में एम्स पटना के विशेषज्ञों ने परंपरागत सोच को पीछे छोड़ते हुए एक साहसिक निर्णय लिया। ऑर्थोपेडिक्स, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने तय किया कि अम्प्यूटेशन नहीं, लिंब सेवेज (अंग संरक्षण) होगा।
अगस्त 2025 से जनवरी 2026 तक मरीज को कीमोथेरेपी दी गई जिससे ट्यूमर का आकार घटा और एक नई संभावना ने जन्म लिया। 13 मार्च 2026…एक निर्णायक दिन। एम्स पटना के ऑपरेशन थिएटर में एक जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंजाम दिया गया जिसमें कैंसर से प्रभावित टिबिया के हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाला गया। हड्डी को शरीर से बाहर निकालकर 50 Gy उच्च डोज रेडिएशन दिया गया। पूरी तरह निष्क्रिय की गई हड्डी को फिर से उसी स्थान पर प्रत्यारोपित किया गया। मजबूती के लिए टाइटेनियम प्लेट और स्क्रू लगाए गए और अंत में मसल फ्लैप तकनीक से संरचना और कार्यक्षमता को पुनर्जीवित किया गया। यह प्रक्रिया सिर्फ तकनीक नहीं थी, यह एक जीवन को नया आकार देने का प्रयास था। सर्जरी के बाद उम्मीदों ने हकीकत का रूप लेना शुरू किया। दूसरे ही दिन से फिजियोथेरेपी शुरू हुई। तीन सप्ताह में स्थिर स्थिति में मरीज को डिस्चार्ज किया गया और अब मरीज सहारे से चलने में सक्षम हो गया है। दरअसल हर कदम के साथ, वह सिर्फ चल नहीं रहा बल्कि वह अपनी जिंदगी को फिर से जी रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जहां पहले ऐसे मामलों में अम्प्यूटेशन ही एकमात्र विकल्प था वहीं अब आधुनिक तकनीक, टीमवर्क और सटीक योजना से अंग बचाना संभव हो रहा है। सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. जगजीत कुमार पांडेय ने कहा कि यह सफलता बताती है कि समय पर निदान, टीमवर्क और आधुनिक तकनीक मिलकर न सिर्फ जीवन बचा सकती हैं बल्कि जीवन को बेहतर भी बना सकती हैं। इस ऑपरेशन को सफल बनाने में डॉ. प्रवीण, डॉ. एफ्रेम, डॉ. अज़हर, डॉ. प्रितांजलि, डॉ. निलेश और डॉ. हरिकेश का बहुत ही अहम योगदान रहा। साथ ही एनेस्थीसिया विभाग का भी बहुत महत्वपूर्ण साथ मिला जिनकी मदद से ऑपरेशन सुरक्षित और सफल हो सका। वहीं मकर ध्वज के लिए यह सर्जरी सिर्फ मेडिकल सफलता नहीं थी, यह उनके आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सम्मान की वापसी थी। एम्स पटना की यह उपलब्धि दर्शाती है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थान भी आज विश्वस्तरीय, उन्नत और मानवीय उपचार देने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
