बिहार

एम्स पटना में शुरू हुआ अत्याधुनिक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी सेंटर

फुलवारीशरीफ, अजित। बिहार में एचआईवी संक्रमित मरीजों के इलाज और देखभाल की दिशा में गुरुवार को एक बड़ी पहल हुई. एम्स पटना में अत्याधुनिक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी सेंटर की शुरुआत कर दी गई, जिससे अब राज्य के हजारों मरीजों को बेहतर, नियमित और आधुनिक उपचार सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी. आयुष भवन में स्थापित यह सेंटर बिहार में एचआईवी उपचार सेवाओं को नई मजबूती देने वाला माना जा रहा है.
इस नए एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी सेंटर का उद्घाटन बिहार स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी के परियोजना निदेशक आईएएस अधिकारी सुमित कुमार और एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिगे.) डॉ. राजू अग्रवाल ने संयुक्त रूप से किया. कार्यक्रम में संस्थान के कई वरिष्ठ चिकित्सक, फैकल्टी सदस्य, स्वास्थ्यकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। एम्स पटना में इस सुविधा की शुरुआत के बाद अब बिहार में कुल 35 एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी सेंटर संचालित हो रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह सेंटर सिर्फ पटना ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के मरीजों के लिए भी बड़ी राहत साबित होगा. यहां मरीजों को निःशुल्क एंटीरेट्रोवायरल दवाएं, नियमित जांच, लैब सुविधा, काउंसिलिंग, संक्रमण प्रबंधन और दीर्घकालिक फॉलोअप जैसी सेवाएं एक ही जगह पर मिलेंगी।

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मुख्य अतिथि सुमित कुमार ने कहा कि एचआईवी मरीजों को सम्मानजनक और भेदभाव रहित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है. उन्होंने कहा कि एम्स पटना में यह सेंटर शुरू होने से राज्य में उपचार व्यवस्था और मजबूत होगी तथा मरीजों को समय पर दवा और निगरानी की सुविधा मिलेगी। वहीं एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने कहा कि एचआईवी को सामाजिक कलंक नहीं बल्कि एक सामान्य चिकित्सीय स्थिति के रूप में देखने की जरूरत है. समाज को संक्रमित लोगों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए ताकि वे बिना डर और भेदभाव के इलाज प्राप्त कर सकें। एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी सेंटर के नोडल पदाधिकारी प्रो. (डॉ.) ज्योति प्रकाश ने बताया कि यह केंद्र मरीजों की नियमित मॉनिटरिंग, समय पर इलाज शुरू करने और उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने कहा कि एचआईवी के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज, स्वास्थ्य संस्थानों और सरकारी एजेंसियों की साझा भागीदारी जरूरी है. जागरूकता और संवेदनशीलता ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा माध्यम है।

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