पटना, अजित : आज की जीवनशैली की वजह से बुजुर्ग लोगों के साथ-साथ 40 वर्ष की उम्र पार करते-करते लोगों में घुटनों के दर्द की समस्या होने लगती है. मेडिकल क्षेत्र में आयी आधुनिकता घुटनों के दर्द से जूझ रहे मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही है रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट. यह तकनीक जिसमें रोबोट की सटीकता से नी रिप्लेसमेंट को अंजाम दिया जाता है, और बेहतर परिणाम सुनिश्चित किये जाते हैं।
सर्जरी से पहले रोबोट की कार्यप्रणाली निर्धारित की जाती है और उसके अंदर सर्जरी के जुड़े दिशानिर्देश डाल दिए जाते हैं। रोबोट के सर्जरी करने के दौरान भी उसकी कार्य प्रणाली में बदलाव करना संभव है साथ ही रोबोट में 3 प्रकार के सिक्योरिटी सेंसर है जो उसके काम करने के दौरान भी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। रोबोट द्वारा सर्जरी अन्य तकनीक के मुकाबले अधिक सुरक्षित है, क्यूंकि यह सर्जरी से पहले और सर्जरी के दौरान पूर्णतः सर्जन के नियंत्रण में रहता है।
भविष्य की इस तकनीक के बारे में जानकारी साँझा किया सर्वोदय हॉस्पिटल, सेक्टर-8 फरीदाबाद के जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के डायरेक्टर एवं 24000 से अधिक जॉइंट रिप्लेसमेंट का अनुभव रखने वाले डॉ. सुजॉय भट्टाचार्जी ने. उन्होंने बताया की रोबोट से जॉइंट रिप्लेसमेंट के सर्वश्रेष्ठ नतीजे मिलते हैं। इसके साथ-साथ रोबोट द्वारा जॉइंट रिप्लेसमेंट के अन्य फायदे भी होते हैं जैसेः लिगामेंट अथवा मांसपेशियों को बचाकर जल्द रिकवरीः इसमें हम न्यूनतम चीरे से घुटने के केवल जरुरी भाग को ही बदलते हैं और लिगामेंट को बचाते हैं। जिसका फायदा मरीज को जल्दी रिकवरी के रूप में मिलता है और मरीज को लगता ही नहीं की उसकी नी रिप्लेसमेंट सर्जरी भी हुई है।
जॉइंट रिप्लेसमेंट के लिए यह बहुत अहम् होता है कि इम्प्लांट को बिलकुल सीध में लगाया जाये अन्यथा वह जल्दी खराब हो जायेगा। जब रोबोट से हड्डी को काटा जाता है तो हम हड्डी को बिल्कुल सटीकता से काट पाते हैं और वहाँ सटीक इम्प्लांट लगा पाते हैं। आज के समय में यह सटीकता अन्य किसी तकनीक से प्राप्त ही नहीं की जा सकती। इसलिए मरीज को लम्बे समय तक दर्दमुक्त नी रिप्लेसमेंट का लाभ मिल पाता है।
इसके आलावा कई मामले मे जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के 2 घंटे बाद चलना संभवः जब हम न्यूनतम चीरे, कम रक्तस्त्राव और सटीक इम्प्लांट के साथ सर्जरी करते हैं, तो मरीज का, कम दर्द के साथ, सर्जरी के 2 घंटे के बाद ही साथ चलाना संभव हो पाता है। फलस्वरूप मरीज कम दिन के लिए हॉस्पिटल में एडमिट रहता है और सर्जरी के बाद उसको फिजियोथेरपि की भी आवश्यकता नही रहती है।
