बिहार

पशुपालकों तक बेहतर सेवा पहुंचाने के लिए तकनीशियनों को दिया गया आधुनिक प्रशिक्षण

फुलवारीशरीफ, अजित। बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना में कॉमफेड द्वारा वित्तपोषित तथा भारत सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना के तहत चलंत स्वावलंबी कृत्रिम गर्भाधान कर्ता (मैत्री) के लिए एक माह का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. इस प्रशिक्षण में बिहार के लगभग सभी जिलों से आए प्रशिक्षनार्थी भाग ले रहे हैं. कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य राज्य में कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं का विस्तार करना, पशुओं की नस्ल में सुधार लाना तथा ग्रामीण पशुपालकों को उनके द्वार पर गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक सेवाएं उपलब्ध कराना है।

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा विकसित पशु उत्पादकता एवं स्वास्थ्य सूचना नेटवर्क पोर्टल के माध्यम से पशुओं से संबंधित स्वास्थ्य, उत्पादन, प्रजनन, आहार और सेवाओं के डिजिटल अभिलेख तैयार करने, उन्हें ऑनलाइन अपलोड करने तथा आंकड़ों के विश्लेषण की व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है. प्रशिक्षनार्थियों को यह सिखाया गया कि क्षेत्र स्तर से प्राप्त सटीक और समयबद्ध आंकड़ों के आधार पर पशुपालन सेवाओं की गुणवत्ता को किस प्रकार बेहतर किया जा सकता है। डिजिटल अभिलेखन, संगणक अनुप्रयोग तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संभावित उपयोग से संबंधित प्रशिक्षण सत्र का संचालन विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी-सह-प्रभारी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी सत्य कुमार ने किया. उन्होंने प्रशिक्षनार्थियों को पोर्टल पर आंकड़ों की प्रविष्टि, नमूना डेटा भरने, मुख्य सर्वर से समन्वय, दैनिक कार्य विवरण तैयार करने तथा डिजिटल अभिलेखों के आधार पर रिपोर्ट निर्माण की प्रक्रिया का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया. साथ ही उन्होंने बताया कि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से पशु रोगों की शीघ्र पहचान, गर्भाधान की संभावना का पूर्वानुमान, उत्पादन क्षमता का विश्लेषण और पोषण प्रबंधन को और अधिक सटीक एवं प्रभावी बनाया जा सकेगा।

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प्रशिक्षण को संबोधित करते हुए सत्य कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में पशुपालन क्षेत्र अनुभव के साथ-साथ आंकड़ों पर आधारित निर्णय प्रणाली की ओर तेजी से अग्रसर है. जब मैत्री प्रशिक्षित तकनीशियन गांव-गांव जाकर पशुओं का सही और समय पर डिजिटल अभिलेख तैयार करेंगे, तभी शासन स्तर पर योजनाओं का प्रभावी मूल्यांकन संभव होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा. उन्होंने कहा कि मैत्री को केवल कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन नहीं बल्कि डिजिटल पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो ग्रामीण पशुपालकों और प्रशासन के बीच एक मजबूत सेतु की भूमिका निभाएगा।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के निदेशक, प्रसार शिक्षा डॉ. निर्मल सिंह दहिया ने कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राज्य में पशुपालन सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. डिजिटल मंच के माध्यम से प्राप्त विश्वसनीय आंकड़ों से रोग नियंत्रण, नस्ल सुधार, नीति निर्माण और संसाधन वितरण में पारदर्शिता और प्रभावशीलता आएगी, जिससे राष्ट्रीय गोकुल मिशन के लक्ष्यों की प्राप्ति में तेजी मिलेगी। एक जनवरी से तीस जनवरी तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रतिभागियों को राष्ट्रीय गोकुल मिशन की रूपरेखा, मैत्री की भूमिका और दायित्व, पशु प्रजनन की शारीरिक रचना और क्रियाविज्ञान, हीट पहचान, सही समय पर कृत्रिम गर्भाधान, वीर्य संग्रह और संरक्षण, शीत श्रृंखला और द्रव नाइट्रोजन प्रबंधन, उपकरणों की मानक संचालन प्रक्रिया, गर्भ परीक्षण, बछड़ा-बछिया प्रबंधन, दुग्ध उत्पादन से संबंधित पोषण प्रबंधन, रोग नियंत्रण, टीकाकरण, जैव-सुरक्षा उपाय, डिजिटल अभिलेखन, उद्यमिता विकास, सरकारी योजनाओं की जानकारी तथा क्षेत्र भ्रमण और व्यावहारिक प्रदर्शन जैसे विषयों में विशेष रूप से दक्ष किया जा रहा है।

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