बिहार

बीस वर्षों से अधूरी पड़ी कहानी का एक पात्र फिर लौट आया

पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) कभी-कभी समय सिर्फ कैलेंडर के पन्नों पर नहीं गुजरता, वह रिश्तों के भीतर भी एक लंबा सन्नाटा छोड़ जाता है। ऐसा ही एक सन्नाटा लगभग बीस वर्षों तक हमारे नवोदय के 1996 बैच के जीवन में पसरा रहा। उस सन्नाटे का नाम था-कुमार गौरव।

तलाश जो खत्म नहीं हुई : मित्रता की डोर ने आखिरकार रास्ता ढूंढ़ लिया :

स्कूल की घंटियों, हॉस्टल की शरारतों, परीक्षा की रातों, साझा सपनों और अनगिनत यादों का साथी अचानक समय की धूल में कहीं खो गया था। वर्षों तक उसके मित्र उसे खोजते रहे। किसी ने पुराने परिचितों से पूछा, किसी ने सोशल मीडिया के कोनों में तलाश की, तो किसी ने उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा। लेकिन हर कोशिश अंततः एक अधूरी कहानी बनकर रह जाती थी। फिर एक दिन, जैसे किसी पुराने उपन्यास का खोया हुआ अध्याय अचानक मिल जाए, वैसा ही कुछ हुआ। इसी बीच राकेश कुमार निराला को कुमार गौरव के बारे में जानकारी मिली। यह सिर्फ एक सूचना नहीं थी; यह उन मित्रताओं के पुनर्जन्म की खबर थी जो वर्षों से अपने एक पात्र की प्रतीक्षा कर रही थीं। राकेश ने बिना देर किए उसे बैच के समूह से जोड़ दिया। और फिर जो हुआ, वह किसी साधारण व्हाट्सऐप संदेश का आदान-प्रदान नहीं था।

तुम आखिरकार मिल गए : स्वागत में छलक पड़ा बीस वर्षों का इंतज़ार :

समूह में वर्षों से दबे हुए भावनाओं के दरवाजे खुलने लगे। अमित, दिव्या, महेश, ज्योति, जितेन्द्र और स्वाति सहित सभी ने उसका स्वागत किया। शब्द छोटे थे, लेकिन उनके पीछे बीस वर्षों की प्रतीक्षा खड़ी थी। हर संदेश में एक अनकहा वाक्य छिपा था-“तुम आखिरकार मिल गए।

राकेश कुमार निराला ने कहा कि कुमार गौरव को खोजने की कोशिश वर्षों से चल रही थी। आज उसे फिर अपने बीच देखकर लग रहा है कि हमारे बैच की एक अधूरी कड़ी आखिरकार जुड़ गई है। दिव्या ने कहा कि कुछ नाम समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते। कुमार गौरव की वापसी ने एक साथ ढेर सारी पुरानी यादों और भावनाओं को फिर से जीवंत कर दिया है। अमित ने कहा कि बीस साल बाद भी अपनापन वैसा ही बना रहे, यही सच्ची दोस्ती की पहचान है। कुमार गौरव का लौटना हम सभी के लिए किसी खूबसूरत सरप्राइज से कम नहीं है।”

लेकिन इस पुनर्मिलन की सबसे गहरी प्रतिध्वनि उन लोगों की आवाज़ में सुनाई दी, जिनके लिए यह सिर्फ एक मित्र की वापसी नहीं, बल्कि अपने अतीत से दोबारा मिलने जैसा था।

Advertisements
Ad 1

संघर्ष, सपने और स्मृतियों में जीवित रहा एक मित्र :

तरुण,अचानक उन गलियारों में लौट गया जहाँ दोस्ती किसी स्वार्थ से नहीं, सिर्फ साथ होने से बनती थी। उसने उन दिनों को याद किया जब भविष्य अनिश्चित था, लेकिन मित्रता सबसे बड़ा भरोसा थी। तरुण ने बताया कि नवोदय की यादें अपनी जगह हैं, लेकिन मेरे लिए कुमार गौरव सिर्फ स्कूल का दोस्त नहीं है। पटना में बिताए वे दिन आज भी याद हैं, जब हम अपने-अपने सपनों को आकार देने की कोशिश कर रहे थे। जीवन की भागदौड़ में लोग बिछड़ जाते हैं, लेकिन कुछ दोस्त दिल के किसी कोने में हमेशा मौजूद रहते हैं। आज इतने वर्षों बाद उसका मिलना ऐसा लग रहा है जैसे समय का कोई खोया हुआ हिस्सा फिर वापस मिल गया हो।

रंजीत ने भी अपने मन के पन्ने खोले। उसने उन स्मृतियों को शब्द दिए जो वर्षों से मन में सुरक्षित थीं। वह दौर, जब मोबाइल नहीं थे लेकिन दोस्ती थी; जब सोशल मीडिया नहीं था लेकिन एक-दूसरे के लिए समय था; जब पहचान किसी प्रोफाइल से नहीं, बल्कि व्यक्तित्व से होती थी।बीस साल बहुत लंबा समय होता है। रंजीत ने कहा कि इस दौरान न जाने कितनी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, लेकिन कुछ रिश्ते समय की पकड़ से बाहर रहते हैं। कुमार गौरव के मिलने की खबर ने अचानक उन दिनों को जीवंत कर दिया, जब दोस्ती किसी औपचारिकता की मोहताज नहीं थी। ऐसा लग रहा है जैसे हमारी पीढ़ी की एक अधूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पात्र फिर से लौट आया हो।

जब लौटता है कोई अपना, तो सिर्फ व्यक्ति नहीं, पूरा एक दौर लौट आता है :

सबकी बातें सुनते हुए कुमार गौरव भी भावुक हो उठा। उसने स्वीकार किया कि उसने अपने मित्रों को बहुत याद किया। जीवन की भागदौड़, परिस्थितियों और समय के लंबे अंतराल ने भले ही दूरी पैदा कर दी हो, लेकिन स्मृतियों के धागे कभी टूटे नहीं थे। उसके शब्दों में वर्षों की अनुपस्थिति का दर्द भी था और अपने लोगों के बीच लौट आने की राहत भी।

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के मिलने की नहीं है। यह कहानी उस विश्वास की है जहां जुड़ाव समय से बड़ी होती है।यह कहानी उन लोगों की है जिन्होंने दो दशक बीत जाने के बाद भी अपने मित्र को अपनी यादों से गायब नहीं होने दिया। यह कहानी इस बात की है कि कुछ रिश्ते संपर्क सूची में नहीं, दिल की स्मृतियों में सुरक्षित रहते हैं।और जब वह लौटा, तो केवल एक व्यक्ति नहीं लौटा—उसके साथ नवोदय के वे दिन, वे चेहरे, वे सपने और वह अपनापन भी लौट आया, जो वर्षों से कहीं भीतर सुरक्षित पड़ा था। कुमार गौरव की वापसी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुछ रिश्तों की उम्र कैलेंडर से नहीं, यादों से तय होती है।

Related posts

भारत और जापान ने मुक्त, खुले और नियम आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई

विदेश मंत्रालय के पश्चिम मामलों के सचिव सिबी जॉर्ज ने पोलैंड के विदेश और आर्थिक मंत्रालय के अधिकारियों से की वार्ता

अंग गौरव सम्मान से अलंकृत हुए अंतर्राष्ट्रीय सैंड आर्टिस्ट मधुरेंद्र कुमार

error: