बिहार

90 के दशक में जिनको बिहार की जनता भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में देख रही थी, आज आनंद मोहन पर दो कौड़ी के लोग सवाल उठा रहे

बिहार, संतोष कुमार : राजनीति में कुछ नाम केवल नेता नहीं, बल्कि एक दौर, एक विचार और एक संघर्ष की पहचान बन जाते हैं। आनंद मोहन सिंह ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी राजनीति केवल सत्ता तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक चेतना, संघर्ष और जनआंदोलन की आवाज बनकर उभरी।
आनंद मोहन एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रही हैं। उनके परिवार के महान स्वतंत्रता सेनानी रामबहादुर सिंह सहित कई लोगों ने देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया। यही राष्ट्रवादी और संघर्षशील संस्कार आगे चलकर आनंद मोहन के व्यक्तित्व की पहचान बने।

जेपी आंदोलन के दौर में उन्होंने युवावस्था से ही अन्याय और तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की। आपातकाल के समय सत्ता के विरोध की कीमत उन्हें दो वर्षों की जेल यात्रा के रूप में चुकानी पड़ी, लेकिन संघर्ष का रास्ता उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। कोसी की मिट्टी में जन्मे आनंद मोहन को लोग इसलिए भी याद करते हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा सत्ता के सामने झुकने के बजाय जनता की आवाज बनने का प्रयास किया।

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मैथिली भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल कराने के आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका और अथक मेहनत को भुलाया नहीं जा सकता। भगत सिंह और नेल्सन मंडेला को अपना आदर्श मानने वाले आनंद मोहन ने संघर्ष को ही जीवन का मार्ग बनाया। अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में वे चंद्रशेखर से काफी प्रभावित रहे, जबकि स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी नेता Parmeshwar Kunwar उनके राजनीतिक गुरु माने जाते हैं। वर्ष 1980 में उन्होंने क्रांतिकारी समाजवादी सेना का गठन किया। यद्यपि प्रारंभिक चुनावों में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन जनाधार लगातार मजबूत होता गया।

1990 में वे जनता दल से बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1993 में बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना कर प्रदेश की राजनीति में नई धारा खड़ी की। 1995 के दौर में युवा वर्ग उन्हें बिहार के भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखने लगा था। उनकी पार्टी ने उस समय कई स्थापित दलों से बेहतर प्रदर्शन कर राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंकाया।

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