नई दिल्ली, (न्यूज़ क्राइम 24) इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज के पूर्व संरक्षक-प्रमुख और ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव रहे डॉ. मंजूर आलम की स्मृति में शनिवार को नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के स्पीकर हॉल में एक महत्वपूर्ण श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में देश और विदेश की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने हिस्सा लेकर डॉ. मंजूर आलम के बौद्धिक, शैक्षणिक और सामाजिक योगदान को याद किया तथा उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया।
मलेशिया के अंतरराष्ट्रीय इस्लामी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दाऊद ए. याह्या अल-हद्दाबी ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम ने एक शिक्षाविद और बुद्धिजीवी के रूप में अमिट छाप छोड़ी. उन्होंने मुसलमानों के पिछड़ेपन, सामाजिक न्याय और अंतरधार्मिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया. उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों को समाजशास्त्र से जोड़ते हुए सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया। अमेरिका स्थित गोल्स इंस्टीट्यूट ग्लोबल के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. जसिर औदा ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम का बौद्धिक चिंतन केवल भारत तक सीमित नहीं था बल्कि उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी. उन्होंने इस्लामी अर्थशास्त्र और दान-पुण्य के अध्ययन में अहम योगदान दिया तथा नई पीढ़ी को अपने विचारों से प्रभावित किया. उन्होंने मदीना में रहते हुए पवित्र कुरान के अंग्रेजी अनुवाद में भी योगदान दिया।
जमात-ए-इस्लामी हिंद के अमीर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम का अकादमिक और शोध कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण था. वे विभिन्न विचारधाराओं के लोगों को साथ लेकर चलने और नवोन्मेषी परियोजनाओं को लागू करने में विश्वास रखते थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और संसाधनों का उपयोग समाज के हित में किया। देश के प्रख्यात इस्लामी विद्वान मौलाना खलील-उर-रहमान सज्जाद नोमानी ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम मतभेदों का सम्मान करते थे और हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली लोगों को जोड़ने का प्रयास करते थे. उन्होंने हजरत मौलाना काजी मुजाहिदुल इस्लाम कासमी के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण कार्य किए और समाज को नई दिशा दी। पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम की सबसे बड़ी चिंता भारत के भविष्य को सुरक्षित करना था.
उन्होंने सच्चर समिति और अन्य बौद्धिक पहलों में महत्वपूर्ण सहयोग दिया तथा समाज को भय और विभाजन से बचाने के लिए निरंतर प्रयास किए। जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. अख्तर-उल-वसी ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम ने अपने समर्पण और परिश्रम से इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज जैसे विचार-मंथन केंद्र की स्थापना की, जिसने विभिन्न विचारधाराओं के लोगों को एक मंच पर लाने का कार्य किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम से उनके घनिष्ठ संबंध थे और वे निष्पक्ष भावना से राष्ट्रसेवा के कार्य में लगे रहते थे. वहीं वरिष्ठ पत्रकार और ईसाई नेता डॉ. जॉन दयाल ने कहा कि डॉ. मंजूर आलम ने अंतरधार्मिक सद्भाव और सामाजिक एकीकरण के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
सऊदी अरब के शिक्षा मंत्रालय से जुड़े डॉ. अब्दुल्ला अल-लुहैदान ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि डॉ. मंजूर आलम ने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मीडिया को एक साथ जोड़कर सकारात्मक बदलाव की दिशा में कार्य किया. उनकी सेवाओं की गूंज भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, जेद्दा और मलेशिया तक सुनाई देती है। कार्यक्रम में मौलाना अनीसुर रहमान कासमी, मौलाना फजलुर रहीम मुजद्दिदी, मौलाना अतीक अहमद बस्तवी, प्रोफेसर हसीना हाशिया, डॉ. मुहम्मद अफजल वानी, प्रोफेसर उमर हसन कासुले, प्रोफेसर एमएच कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार इकबाल अहमद, एयू आसिफ, लेखक पीयूष बबले, डॉ. अली मोहिउद्दीन अल-करादागी, शेख निजामुद्दीन, डॉ. आफताब आलम, पूर्व सांसद अहमद अशफाक करीम और पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम समेत कई प्रमुख हस्तियों ने अपने विचार रखे और डॉ. मंजूर आलम की सेवाओं को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। चार घंटे तक चले इस कार्यक्रम का संचालन मिल्ली काउंसिल के सहायक महासचिव शेख निजामुद्दीन ने किया, जबकि समापन कार्यवाहक अध्यक्ष मौलाना अनीसुर रहमान कासमी की दुआओं के साथ हुआ।
