बिहार

नन्ही जिंदगी की बड़ी जीत : एम्स पटना में ‘की-होल’ सर्जरी से तीन साल की बच्ची को मिली नई जिंदगी

फुलवारीशरीफ, अजीत। राजधानी पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में चिकित्सकों की कुशलता और आधुनिक तकनीक ने एक नन्ही बच्ची की जिंदगी में नई उम्मीद जगा दी. एम्स पटना के डॉक्टरों ने तीन साल की बच्ची के सीने में मौजूद दुर्लभ ट्यूमर गैंग्लियोन्यूरोमा को अत्याधुनिक मिनिमली इनवेसिव ‘की-होल’ थोराकोस्कोपिक सर्जरी के जरिए सफलतापूर्वक निकालकर उसे नई जिंदगी दी. इस जटिल ऑपरेशन की खास बात यह रही कि बड़े चीरे की जगह मात्र 5-5 मिलीमीटर के तीन छोटे चीरे लगाकर ही करीब 7×6×5 सेंटीमीटर आकार के ट्यूमर को बाहर निकाल लिया गया।

डॉक्टरों के अनुसार यह ट्यूमर बच्ची के सीने के बाएं हिस्से (लेफ्ट हेमीथोरैक्स) के लगभग आधे भाग तक फैल चुका था. सामान्य तौर पर इस तरह के ट्यूमर को निकालने के लिए ओपन थोराकोटॉमी जैसी बड़ी सर्जरी करनी पड़ती है, जिसमें सीने में बड़ा चीरा लगाया जाता है और पसलियों को फैलाया जाता है. इससे मरीज को अधिक दर्द होता है, शरीर पर बड़ा निशान रह जाता है और स्वस्थ होने में भी ज्यादा समय लगता है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए एम्स पटना के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की टीम ने आधुनिक मिनिमली इनवेसिव थोराकोस्कोपिक तकनीक अपनाने का फैसला किया. कैमरा और विशेष उपकरणों की मदद से करीब पांच घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी को डॉक्टरों की टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया. छोटे-छोटे चीरे के कारण बच्ची को बड़े ऑपरेशन से होने वाले दर्द से बचाया जा सका और उसकी रिकवरी भी अपेक्षाकृत तेजी से हुई।

विशेषज्ञों के अनुसार गैंग्लियोन्यूरोमा नसों के ऊतकों से बनने वाला एक दुर्लभ और सामान्यतः सौम्य (बेनाइन) ट्यूमर होता है, जो कभी-कभी सीने में विकसित हो जाता है. छोटे बच्चों में इस प्रकार की थोराकोस्कोपिक ट्यूमर सर्जरी दुनिया के चुनिंदा उन्नत चिकित्सा केंद्रों में ही की जाती है, क्योंकि यह तकनीकी रूप से काफी जटिल होती है और इसके लिए अत्यधिक विशेषज्ञता की जरूरत होती है. ऐसे में एम्स पटना में इस सर्जरी की सफलता संस्थान की बढ़ती चिकित्सा क्षमता और आधुनिक सुविधाओं का प्रमाण मानी जा रही है।

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इस सफल ऑपरेशन को अंजाम देने वाली पीडियाट्रिक सर्जरी टीम में डॉ. अमित कुमार सिन्हा, डॉ. सौरव श्रीवास्तव, डॉ. अमित कुमार, डॉ. राशि, डॉ. दिगंबर चौबे और डॉ. गौरव शांडिल्य शामिल थे. सभी चिकित्सकों ने बेहतरीन टीमवर्क और विशेषज्ञता का परिचय देते हुए इस जटिल सर्जरी को सफल बनाया। सर्जरी की सफलता में पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया टीम की भी अहम भूमिका रही. इस टीम का नेतृत्व डॉ. चांदनी ने किया. उन्होंने अत्याधुनिक ब्रोंकियल ब्लॉकर तकनीक की मदद से सिंगल-लंग वेंटिलेशन दिया, जो इतने छोटे बच्चे में करना काफी चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

ऑपरेशन के बाद बच्ची की स्थिति तेजी से बेहतर हुई. उसे ऑपरेशन थिएटर में ही एक्सट्यूबेट कर दिया गया और चिकित्सकों की निगरानी में उसकी रिकवरी संतोषजनक रही. कुछ ही दिनों में बच्ची पूरी तरह स्वस्थ हो गई और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, जिससे उसके परिवार में खुशी का माहौल है। एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने इस उपलब्धि पर पूरी मेडिकल टीम को बधाई देते हुए कहा कि संस्थान का उद्देश्य मरीजों, खासकर बच्चों को आधुनिक, सुरक्षित और संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है. उन्होंने कहा कि मिनिमली इनवेसिव तकनीकों के बढ़ते उपयोग से मरीजों को कम दर्द, कम समय में रिकवरी और बेहतर इलाज मिल रहा है। यह उपलब्धि न केवल एम्स पटना के लिए गर्व का विषय है, बल्कि बिहार और पूर्वी भारत के लोगों के लिए भी भरोसे का संदेश है कि अब अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उनके अपने राज्य में ही उपलब्ध हो रही हैं।

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