बिहार

रोज़ा, रूहानी फ़र्ज़ और वैज्ञानिक सच्चाई : इमरान गणी

फुलवारीशरीफ, अजित। वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद मोहम्मद इमरान गणी ने रमजान के महीने में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि रोज़ा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मानुशासन का व्यापक प्रशिक्षण है. यह वह इबादत है जो इंसान को भूख और प्यास के माध्यम से सब्र, हमदर्दी और आत्मनियंत्रण का पाठ पढ़ाती है. किंतु आज जब विज्ञान मानव शरीर की जटिलताओं को गहराई से समझने में सक्षम हुआ है, तो यह तथ्य भी सामने आया है कि रोज़ा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि शारीरिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावकारी प्रक्रिया है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध संकेत देते हैं कि नियंत्रित उपवास शरीर में “ऑटोफैगी” नामक प्रक्रिया को सक्रिय करता है. यह वह प्राकृतिक व्यवस्था है जिसके माध्यम से शरीर अपनी क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट कर नई कोशिकाओं का निर्माण करता है. इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और दीर्घकालिक बीमारियों का जोखिम कम हो सकता है. सीमित समय में भोजन ग्रहण करने से इंसुलिन की संवेदनशीलता बेहतर होती है, जिससे मोटापा और टाइप-2 मधुमेह जैसी समस्याओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

हृदय स्वास्थ्य के संदर्भ में भी संतुलित उपवास लाभकारी सिद्ध हुआ है. रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर में सुधार देखा गया है. मानसिक स्तर पर इसके सकारात्मक परिणाम—ध्यान, एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता—भी सामने आए हैं. जब शरीर भौतिक इच्छाओं से विराम लेता है, तो मन अधिक सजग और संतुलित हो जाता है। लेकिन हर सकारात्मक पक्ष के साथ सावधानियाँ भी जुड़ी होती हैं. यदि सहरी और इफ़्तार असंतुलित हों—अत्यधिक तला-भुना, मीठा या भारी भोजन लिया जाए—तो रोज़ा स्वास्थ्य लाभ के स्थान पर हानि पहुँचा सकता है. डिहाइड्रेशन, एसिडिटी, कमजोरी और रक्त शर्करा के उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. विशेष रूप से मधुमेह, गर्भावस्था, गुर्दे की बीमारी या अन्य गंभीर रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि रोज़े की असली रूह संतुलन में है. यदि दिनभर संयम और रातभर अतिरेक हमारा व्यवहार बन जाए, तो इसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है. रोज़ा हमें केवल खाने-पीने से नहीं रोकता, बल्कि बुरे विचारों, कठोर शब्दों और अन्यायपूर्ण व्यवहार से भी रोकता है. यह आत्मनिरीक्षण का महीना है—जहाँ इंसान स्वयं से प्रश्न करता है कि वह अपने भीतर क्या बदल सकता है.

Advertisements
Ad 1

सामाजिक दृष्टि से भी रोज़ा अत्यंत महत्वपूर्ण है. भूख का अनुभव हमें समाज के वंचित वर्गों के दर्द के करीब लाता है. इससे करुणा और दानशीलता की भावना प्रबल होती है. यही कारण है कि इस माह में ज़कात और सदक़ा की परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है—ताकि समाज में आर्थिक संतुलन और मानवीय संवेदना को बढ़ावा मिले.

वर्तमान उपभोक्तावादी दौर में, जहाँ इच्छाओं की कोई सीमा नहीं, रोज़ा संयम का संदेश देता है. यह बताता है कि मनुष्य की शक्ति उसके उपभोग में नहीं, बल्कि उसके नियंत्रण में है. विज्ञान और आध्यात्म, दोनों की दृष्टि से देखा जाए तो रोज़ा शरीर को विश्राम, मन को अनुशासन और आत्मा को शांति प्रदान करता है। अतः आवश्यक है कि हम रोज़े को केवल परंपरा के रूप में न निभाएँ, बल्कि उसकी वैज्ञानिक, नैतिक और सामाजिक गहराई को समझते हुए अपनाएँ. जब रोज़ा सजगता, संतुलन और सच्ची नीयत के साथ रखा जाता है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करता है—मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना।

Related posts

होली के जश्न में हादसा : हर्ष फायरिंग में एक की मौत, दूसरा घायल

होली शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न, फुलवारी शरीफ सहित आसपास के इलाकों में लोगों ने खेली रंगों की होली

होली के दिन चौक थाना पुलिस की कार्रवाई, टेम्पो से 210 लीटर देसी शराब बरामद!

error: