दिल्ली, सोनू कुमार : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि हथकरघा क्षेत्र केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि समावेशी विकास का एक सशक्त माध्यम भी है। आज नई दिल्ली में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से हथकरघा भारत की संस्कृति और सभ्यता का अभिन्न हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र ने देश की समृद्ध विरासत को संरक्षित रखने के साथ-साथ रोजगार, महिला सशक्तिकरण, कला, संस्कृति और प्रकृति के प्रति प्रेम को भी बढ़ावा दिया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हथकरघा क्षेत्र रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध कराता है। उन्होंने बताया कि देश के हथकरघा क्षेत्र से 35 लाख से अधिक लोग जुड़े हैं, जिनमें लगभग 25 लाख महिलाएं हैं। उन्होंने कहा कि हथकरघा भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता की भावना से भी गहराई से जुड़ा है तथा यह देश की अद्भुत सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। राष्ट्रपति ने देश के बुनकरों, उद्यमियों, डिजाइनरों, विद्यार्थियों और हथकरघा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को शुभकामनाएं दीं।
इस अवसर पर वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि सरकार हथकरघा को एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र के रूप में बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में हथकरघा उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना है और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि इस बढ़ती मांग का लाभ सीधे बुनकरों तक पहुंचे। उन्होंने युवाओं से भी बुनाई को एक पेशे के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने वर्ष 2025 के संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए। कुल 22 पुरस्कार दिए गए, जिनमें 3 संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल हैं। ये पुरस्कार बुनकरों को उनकी उत्कृष्ट शिल्पकला, नवाचार और भारत की हथकरघा परंपरा के संरक्षण में योगदान के लिए प्रदान किए गए।
इस अवसर पर देश की समृद्ध और विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं को समर्पित चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए गए।
