बिहार

शहीद अभिषेक का प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी मनाया गया शहादत दिवस

अररिया, रंजीत ठाकुर। ए मेरी जमीं अफसोस नहीं,जो तेरे लिए सो दर्द सहे…यह गीत लोगों में देशभक्ति का जज्बा पैदा कर जाता है। लेकिन,हम 20 अक्टूबर 2008 को छत्तीसगढ़ के थिंकीगुट्टा जंगल में नक्सलियों से लड़ते हुए शहीद हुए अभिषेक कुमार सिंह को कैसे भूल गये। बता दें कि देश के लिए शहीद होने वालों में लाल अररिया ने भी दिये हैं। लेकिन हम उन्हें भूल जा रहे हैं। बता दें कि भारतीय सेना हर मुश्किल में हमारी रक्षा करती है,लेकिन हम उन्हें श्रद्धा के दो पुष्प भी समर्पित नहीं कर पाते हैं। अररिया जिले के भरगामा प्रखंड के शंकरपुर निवासी शहीद अभिषेक ग्राम मोदकपाल,जिला बाजीपुर के थिंकीगुट्टा जंगल में पेट्रोलिंग के दौरान आतंकी हमले में नक्सलियों से बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गये थे। आज भी उन्हें भाई,माँ व पिता याद कर सिसक उठते हैं।

वह हर लम्हे को डायरी में कैद कर रहा था: पिता

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जीडी अभिषेक कुमार सिंह चन्द्रशेखर सिंह व मां विभा देवी के बड़े पुत्र थे। जब हमारे सहयोगी ने उनसे बात की। तो उन्होंने अपने पुत्र पर गर्व करते हुए कहा कि उसे डायरी लिखने का बड़ा शौख था। उसके डायरी में आज भी वह चंद अल्फाज को याद कर उनका गला रुंध गया,आजादी लाखों लालों की कुर्बानी ले चुकी है। उसे यूं तो आसानी से गंवा नहीं सकते दुश्मन हिंदुस्तान की एक इंच जमीन पर कब्जा कर ले ये एक सैनिक कभी गवारा नहीं कर सकता एक सैनिक के लिए जंग आसान नहीं,लेकिन उसका प्रोत्साहन यही है कि पूरा देश उस पर भरोसा कर चैन की नींद सौ रहा है। बहुत कुछ करना है जीवन बहुत छोटा है। एक तिहाई जीवन बीत गया। छत्तीसगढ़ हमले में शहीद हुए अभिषेक कुमार सिंह की डायरी में लिखे ये शब्द हैं। भाई रोशन कुमार सिंह कहते हैं कि भैया के मन में हमेशा से देश सेवा की चाहत थी। प्रभावित होकर हीं सीआरपीएफ ज्वाइन किया। भैया भले हीं शहीद हो गये,लेकिन आज भी वो हमारे जेहन में हैं। उन्हीं के याद में प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष में 20 अक्टूबर शुक्रवार को उनका शहादत दिवस मनाया गया।

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