पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) नालंदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एनएमसीएच) के मेडिकल एजुकेशन यूनिट (एमईयू) की ओर से बुधवार को संकाय सदस्यों एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए “आत्महत्या: रोकथाम, प्रबंधन और मेडिको-लीगल पहलू” विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत मनोचिकित्सा विभाग की डॉ. रूपम के व्याख्यान से हुई। उन्होंने आत्महत्या के प्रमुख कारणों और जोखिम कारकों, जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान एवं उपचार में मनोचिकित्सकों की भूमिका तथा आत्महत्या के बाद परिजनों और करीबियों पर पड़ने वाले मानसिक एवं भावनात्मक प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के डॉ. शशांक गुप्ता ने आत्महत्या के विभिन्न प्रकारों और ऐसे मामलों की मेडिको-लीगल जांच प्रक्रिया की जानकारी देते हुए फॉरेंसिक विशेषज्ञों की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। एनएमसीएच की प्राचार्य डॉ. (प्रो.) उषा कुमारी ने कहा कि घरेलू हिंसा आत्महत्या की प्रवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कारण है। उन्होंने समय पर हस्तक्षेप और पीड़ितों को उचित सहयोग उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. (प्रो.) अमिता सिन्हा ने बताया कि भारत में औसतन हर तीन मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने, रोकथाम के उपायों को मजबूत करने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव रंजन दास ने अपने व्यावसायिक अनुभव साझा करते हुए बच्चों और किशोरों में अत्यधिक डिजिटल गेमिंग की बढ़ती लत को आत्महत्या के जोखिम से जुड़ा गंभीर कारक बताया। कार्यक्रम में डॉ. (प्रो.) अजय सिन्हा एवं डॉ. (प्रो.) संतोष कुमार ने भी अपने विचार रखे। अंत में डॉ. शिल्पी रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी वक्ताओं, संकाय सदस्यों, स्नातकोत्तर छात्रों एवं मेडिकल एजुकेशन यूनिट का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और आत्महत्या की रोकथाम में स्वास्थ्यकर्मियों की सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत करते हैं।
