पटना, अजित। पटना के पैठानी नत्थूपुर सूर्य मंदिर परिसर में आयोजित श्री श्री 10008 श्री विष्णु महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ में वृंदावन से पधारे कथावाचक देवकीनंदन भारद्वाज महाराज ने समापन दिवस पर श्रद्धालुओं को कथा के माध्यम से जीवन जीने की सरल और प्रेरणादायक सीख दी. कथा सुनने के लिए आसपास के कई इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. पूरा सूर्य मंदिर परिसर भक्ति, भजन और भगवान के जयकारों से भक्तिमय बना रहा।
कथावाचक महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में दुःख और तनाव का सबसे बड़ा कारण कर्ताभाव है. जब इंसान यह सोचने लगता है कि हर काम उसी ने किया है और सफलता केवल उसकी मेहनत से मिली है, तभी उसके भीतर अहंकार और फल की इच्छा पैदा होने लगती है. इसके बाद व्यक्ति हर काम का परिणाम अपने मन के अनुसार चाहता है. जब उसे मनचाहा फल नहीं मिलता तो वह निराशा, दुख और तनाव में घिर जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को हमेशा अच्छे कर्म करते रहना चाहिए, लेकिन यह भाव नहीं रखना चाहिए कि सब कुछ वही कर रहा है. करने और कराने वाले केवल भगवान हैं. यदि इंसान भगवान पर भरोसा रखकर बिना लालच और अहंकार के कर्म करेगा तो उसका मन हमेशा शांत रहेगा. परिणाम चाहे अच्छा आए या बुरा, ऐसे व्यक्ति का विश्वास कभी नहीं डगमगाता और उसे हर परिस्थिति में आनंद की अनुभूति होती है।
महाराज ने कहा कि कर्मयोगी बनकर जीवन जीना सबसे श्रेष्ठ मार्ग है. जो व्यक्ति बिना स्वार्थ और अहंकार के कर्म करता है, वह जीवन में मानसिक शांति प्राप्त करता है और कर्मों के बोझ से भी बचा रहता है. उन्होंने कहा कि भगवान ने मनुष्य को कर्म करने के लिए भेजा है, इसलिए हर परिस्थिति में सकारात्मक सोच के साथ अपने कर्तव्य निभाने चाहिए। युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरत आत्मविश्वास बढ़ाने की है. वर्तमान समय में कई युवा छोटी-छोटी असफलताओं से घबरा जाते हैं और निराश हो जाते हैं. आत्मविश्वास कमजोर होने के कारण वे सफलता से दूर रह जाते हैं. उन्होंने कहा कि जिंदगी कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. यदि इंसान अपने ऊपर भरोसा रखे, मेहनत करे और भगवान का स्मरण करता रहे तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
श्रीमद्भागवत कथा के दौरान महाराज ने राजा परीक्षित का प्रसंग भी सुनाया. उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित जैसे शक्तिशाली और धर्मात्मा राजा भी कलयुग में अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख सके. क्रोध में आकर उन्होंने ऋषि शामिक का अपमान कर दिया. इसके बाद ऋषि पुत्र श्रृंगी ने उन्हें श्राप दे दिया कि सातवें दिन सर्पदंश से उनकी मृत्यु होगी। महाराज ने कहा कि श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने सांसारिक मोह छोड़कर भगवान की भक्ति और कथा श्रवण का मार्ग अपनाया. सात दिनों तक उन्होंने श्रद्धा से भागवत कथा सुनी और अंत में उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई. इस प्रसंग के माध्यम से महाराज ने बताया कि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और भगवान की भक्ति ही जीवन का सच्चा मार्ग है। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति में डूबे नजर आए. महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की भारी भीड़ कथा पंडाल में मौजूद रही. आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि महायज्ञ और भागवत कथा को लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग कथा श्रवण के लिए पहुंच रहे हैं।
