(अधिवक्ता चित्रा द्विवेदी, सहायक कानूनी सलाहकार)
न्यूज़ क्राइम 24। किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होते ही सबसे पहला सवाल अक्सर यही होता है—“अब गिरफ्तारी कब होगी?” आम धारणा है कि FIR दर्ज होते ही पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है या गिरफ्तारी निश्चित है। लेकिन कानून की स्थिति इससे अलग है। FIR दर्ज होना और गिरफ्तारी होना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। FIR आपराधिक जांच की शुरुआत है; गिरफ्तारी हर मामले में अनिवार्य कदम नहीं है। विशेष रूप से ऐसे अपराधों में जिनमें अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, BNSS की धारा 35 के तहत गिरफ्तारी के संबंध में महत्वपूर्ण safeguards दिए गए हैं। (India Code)
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में क्या स्पष्ट किया?
Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation, 15 जनवरी 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 35 की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण बात कही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी कोई ऐसी कार्रवाई नहीं है जिसे पुलिस हर FIR के बाद अनिवार्य रूप से करे।
सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना सामान्य नियम है, जबकि गिरफ्तारी अपवाद है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी केवल इसलिए नहीं की जा सकती कि पुलिस को आरोपी से पूछताछ करनी है; गिरफ्तारी के लिए वास्तविक और वस्तुनिष्ठ आवश्यकता होनी चाहिए। इस फैसले ने नागरिकों के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार और पुलिस की जांच की शक्ति के बीच संतुलन को और स्पष्ट किया है।
सात साल तक की सजा वाले अपराध में क्या नियम है?
BNSS की धारा 35(1)(b) के तहत, यदि किसी व्यक्ति पर ऐसा cognizable offence होने का आरोप है जिसकी सजा सात वर्ष तक हो सकती है, तो केवल आरोप या FIR अपने-आप गिरफ्तारी का आधार नहीं बन जाते। पुलिस अधिकारी के पास पहले यह मानने का कारण होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है और गिरफ्तारी के लिए धारा 35 में निर्धारित आवश्यक परिस्थितियों में से कम-से-कम एक परिस्थिति मौजूद हो।
ऐसी परिस्थितियों में उदाहरण के तौर पर यह आवश्यकता शामिल हो सकती है कि गिरफ्तारी:
- व्यक्ति को आगे कोई अपराध करने से रोकने के लिए आवश्यक हो;
- जांच को उचित रूप से आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक हो;
- अपराध के साक्ष्य से छेड़छाड़ रोकने के लिए आवश्यक हो;
- गवाहों को प्रभावित या धमकाने से रोकने के लिए आवश्यक हो; या
- अदालत में व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।
इसलिए पुलिस को गिरफ्तारी की आवश्यकता का कानूनी आधार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गिरफ्तारी को केवल पुलिस की सुविधा या सामान्य पूछताछ का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
Section 35(3) का Notice क्या है?
यदि पुलिस को लगता है कि किसी व्यक्ति से जांच में सहयोग की आवश्यकता है लेकिन तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो BNSS की धारा 35(3) के तहत उसे Notice of Appearance दिया जा सकता है।
इस नोटिस में व्यक्ति को जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करने के लिए कहा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में स्पष्ट किया कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में Section 35(3) का notice rule है और arrest exception है। (Sci API)
क्या Notice मिलने के बाद गिरफ्तारी हो सकती है?
हां, कुछ परिस्थितियों में।
यदि व्यक्ति नोटिस की शर्तों का पालन करता है और जांच में सहयोग करता रहता है, तो सामान्यतः उसे उसी अपराध के संबंध में गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यदि पुलिस अधिकारी रिकॉर्ड किए गए कारणों के आधार पर यह राय बनाता है कि गिरफ्तारी आवश्यक है, तो कानून के अनुसार आगे कार्रवाई की जा सकती है।
इसके विपरीत, यदि व्यक्ति नोटिस का पालन नहीं करता या अपनी पहचान बताने से इनकार करता है, तो BNSS में गिरफ्तारी की शक्ति उपलब्ध हो सकती है, subject to the statutory requirements and applicable court orders. (Sci API)
क्या FIR होने के बाद पुलिस सीधे घर से गिरफ्तार कर सकती है?
यह अपराध की प्रकृति और BNSS की धारा 35 की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यदि अपराध सात वर्ष तक की सजा वाला है, तो केवल FIR दर्ज होने के आधार पर गिरफ्तारी को automatic नहीं माना जा सकता। पुलिस को गिरफ्तारी की आवश्यकता और धारा 35 की शर्तों का पालन करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कारण Section 35(3) notice को ऐसे मामलों में सामान्य नियम बताया है। (Sci API)
हालांकि, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि FIR के बाद गिरफ्तारी कभी नहीं हो सकती। यदि कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद हैं और गिरफ्तारी वास्तव में आवश्यक है, तो पुलिस गिरफ्तार कर सकती है।
सात साल से अधिक सजा वाले अपराध में क्या स्थिति है?
यहां स्थिति अलग हो सकती है।
BNSS की धारा 35 पुलिस को कुछ गंभीर cognizable offences में बिना warrant गिरफ्तारी की शक्ति देती है। इसलिए हर मामले में एक ही formula लागू नहीं किया जा सकता।
अपराध की अधिकतम सजा, अपराध का स्वरूप, उपलब्ध सामग्री, आरोपी का आचरण और जांच की आवश्यकता—इन सभी बातों को देखकर गिरफ्तारी का प्रश्न तय होता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि “हर FIR में arrest नहीं होगी” या “हर FIR में arrest जरूर होगी।”
FIR दर्ज होने के बाद आरोपी के महत्वपूर्ण अधिकार
यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो BNSS कई महत्वपूर्ण procedural safeguards प्रदान करता है।
- गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार
BNSS की धारा 47 के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को उसके खिलाफ गिरफ्तारी के अपराध या अन्य grounds की जानकारी दी जानी चाहिए। गैर-जमानती अपराध के आरोपी को, जहां लागू हो, bail के अधिकार की जानकारी भी दी जानी है। (India Code)
- परिवार या मित्र को सूचना
BNSS की धारा 48 के तहत गिरफ्तारी और व्यक्ति को कहां रखा गया है, इसकी सूचना उसके द्वारा नामित रिश्तेदार, मित्र या अन्य व्यक्ति को दी जानी है। (India Code)
- गिरफ्तारी का Memorandum
BNSS की धारा 36 गिरफ्तारी की प्रक्रिया और पुलिस अधिकारी के कर्तव्यों से संबंधित है। पुलिस अधिकारी की स्पष्ट पहचान, arrest memorandum और संबंधित procedural requirements का पालन आवश्यक है।
- वकील से मिलने का अधिकार
BNSS की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति को interrogation के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती है, हालांकि यह अधिकार पूरी interrogation के दौरान लगातार वकील की मौजूदगी के समान नहीं है।
- 24 घंटे के भीतर Magistrate के सामने पेशी
गिरफ्तार व्यक्ति को अनावश्यक देरी के बिना संबंधित Magistrate के सामने पेश किया जाना चाहिए। BNSS की धारा 57 और 58 गिरफ्तारी के बाद custody और Magistrate के समक्ष पेशी से संबंधित प्रावधान करती हैं। (India Code)
- स्वास्थ्य और सुरक्षा
BNSS की धारा 56 के अनुसार custody में रखे गए आरोपी के स्वास्थ्य और सुरक्षा का उचित ध्यान रखना पुलिस/कस्टडी में रखने वाले व्यक्ति का कर्तव्य है। (India Code)
अगर Section 35 का Notice मिले तो क्या करें?
Notice को नजरअंदाज करना सही कदम नहीं है।
व्यक्ति को:
पहला, notice की copy सुरक्षित रखनी चाहिए।
दूसरा, उसमें दी गई तारीख, समय और स्थान को ध्यान से देखना चाहिए।
तीसरा, जांच में सहयोग करना चाहिए।
चौथा, यदि व्यक्ति को गिरफ्तारी की आशंका है, तो परिस्थितियों के अनुसार किसी criminal lawyer से तुरंत कानूनी सलाह लेनी चाहिए।
पांचवां, बिना समझे कोई document sign करने या कोई महत्वपूर्ण statement देने से पहले उसके कानूनी प्रभाव को समझना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि Section 35 के तहत arrest की शक्ति को “strict objective necessity” के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पुलिस की सुविधा के रूप में। (Sci API)
क्या FIR में नाम आने का मतलब दोषी होना है?
बिल्कुल नहीं।
FIR किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। FIR आरोपों और आपराधिक जांच की शुरुआत से संबंधित दस्तावेज है। जांच के दौरान पुलिस साक्ष्य एकत्र करती है और उसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई होती है।
अंततः किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण न्यायालय द्वारा कानून और साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
BNS और BNSS में अंतर समझना भी जरूरी
नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद लोगों में अक्सर BNS और BNSS को लेकर भ्रम रहता है।
Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 (BNS) मुख्यतः अपराध और उनकी सजा से संबंधित substantive criminal law है।
वहीं Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) गिरफ्तारी, जांच, bail, investigation और criminal procedure जैसे procedural matters से संबंधित है।
इसलिए गिरफ्तारी के सवाल पर मुख्य रूप से BNSS की धारा 35 और उसके बाद की arrest-related provisions देखी जाती हैं। BNSS में गिरफ्तारी से संबंधित प्रावधान Sections 35 से 62 के बीच हैं।
आम आदमी के लिए सबसे जरूरी बात
FIR ≠ Arrest ≠ Conviction
तीनों अलग-अलग कानूनी चरण हैं।
FIR दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि आरोपी को हर परिस्थिति में तुरंत गिरफ्तार करना ही होगा। विशेष रूप से सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में सुप्रीम कोर्ट ने Section 35(3) notice को सामान्य नियम और arrest को अपवाद के रूप में स्पष्ट किया है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि FIR के बाद गिरफ्तारी कभी नहीं हो सकती। यदि कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद हैं और जांच के लिए गिरफ्तारी वास्तव में आवश्यक है, तो पुलिस कानून के अनुसार गिरफ्तारी कर सकती है।
नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी विशेष FIR, अपराध की धाराओं या गिरफ्तारी की परिस्थिति में कानूनी सलाह मामले के तथ्यों और लागू धाराओं के आधार पर अलग हो सकती है।
