बिहार

सिजेरियन डिलीवरी : लाइफ-सेविंग सर्जरी से भावनात्मक यात्रा तक

पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) रात के लगभग 11 बजे का समय था। हाजीपुर सदर ब्लॉक के धर्मपुर चौक की 25 वर्षीय आरती रॉय को अचानक दर्द बढ़ने लगा। डॉ. प्रियंका ने चेकअप किया और कुछ गड़बड़ी महसूस हुई। उन्होंने तुरंत कहा “ऑपरेशन करना पड़ेगा।” कुछ ही मिनटों में आरती को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया और उनकी डिलीवरी सिजेरियन से हुई। आठ दिन अस्पताल में रहकर उन्होंने महसूस किया कि अस्पताल की व्यवस्था, सफाई, भोजन और दवाइयाँ सब ठीक थीं, पर भीतर एक अनकहा डर था जो सर्जरी के बाद भी उनके मन में बना रहा।

आरती बताती हैं- “ऑपरेशन के बाद मेरा शरीर तो ठीक हुआ, पर मन नहीं। अचानक हुए बदलाव ने मुझे बेचैन कर दिया था। नींद नहीं आती थी, चिड़चिड़ापन बढ़ गया था। डॉक्टर ने कहा कि मेडिटेशन करो, धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाएगा।”
आरती की कहानी आज बिहार के स्वास्थ्य तंत्र में एक नए विमर्श पर जोर दे रही है कि सिजेरियन डिलीवरी अब सिर्फ एक सर्जरी नहीं, बल्कि मातृत्व की भावनात्मक यात्रा है, जिसमें दर्द और डर के साथ-साथ साहस और आत्मविश्वास भी जन्म लेते हैं।

एफआरयू के चिकित्सकों के अनुसार सी-सेक्शन एक क्लिनिकल प्रोसेस से बढ़कर एक आर्ट है। इसमें समय पर परामर्श, सहानुभूति और भावनात्मक सहयोग, मां के भय और तनाव को काफी हद तक कम करता है। पिछले एक साल में राज्य में क्रियाशील एफआरयू की संख्या 69 से बढ़कर 106 हो गई है। लक्ष्य है कि हर एफआरयू में कम से कम 4–5 सिजेरियन प्रसव प्रति माह हों ताकि आपात स्थिति में समय पर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित हो सके। वित्तीय वर्ष 2025–26 तक 150 एफआरयू को पूर्ण रूप से क्रियाशील करने का लक्ष्य रखा गया है।

एसआरएस के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बिहार की मातृ मृत्यु अनुपात 100 है, जिसे सतत विकास लक्ष्य तक लाने की दिशा में प्रयास जारी हैं। जिसमें गुणवत्तापूर्ण सी-सेक्शन की भूमिका अहम हो सकती है। आंकड़ों में छिपी मातृत्व की कहानी
लेसेंट रिपोर्ट बताती है कि भारत में सी-सेक्शन की दर 2005 में 8.5% से बढ़कर 21.5% हो गई है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार यह दर 10% से अधिक नहीं होनी चाहिए। अत्यधिक सिजेरियन प्रसव न केवल परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाते हैं, बल्कि मां के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।

एम्स पटना की डॉ. इंदिरा प्रसाद बताती हैं कि सी-सेक्शन के बाद 18% माताएँ पेरिपार्टम डिप्रेशन से जूझती हैं। पहले तीन महीने का समय सबसे संवेदनशील होता है। परिवार का सहयोग, भावनात्मक भरोसा और मानसिक स्वास्थ्य की जांच जरूरी है ताकि महिलाएं पूरी तरह स्वस्थ हो सकें। सी-सेक्शन के बाद महिलाएँ शारीरिक और मानसिक तनाव दोनों झेलती हैं, खासकर जिनका डिप्रेशन, प्रीमैच्योर या कम वजन वाला शिशु, या जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी जटिलताएँ रही हों। उन्होंने जोर दिया कि रिकवरी में पारिवारिक समर्थन, नवजात देखभाल में सहयोग और भावनात्मक सहयोग जरूरी है।

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