फुलवारीशरीफ, अजीत। राजधानी पटना के फतेहपुर स्थित काली स्थान मंदिर में सावन के अंतिम मंगलवार को ग्राम देवता और कुलदेवी की पूजा वैदिक विधि-विधान, मंत्रोच्चारण और धार्मिक परंपराओं के साथ संपन्न हुई. पूजा में फतेहपुर सहित आसपास के गांवों से हजारों श्रद्धालु शामिल हुए. मंदिर परिसर दिनभर श्रद्धालुओं से गुलजार रहा. गांव-जवार की खुशहाली और बुरी शक्तियों से बचाव की धार्मिक मान्यता के तहत चली आ रही परंपरा के अनुसार एक जोड़ा कबूतर उड़ाया गया. इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
ग्रामीणों के अनुसार यह पूजा प्रत्येक वर्ष सावन के अंतिम मंगलवार को आयोजित होती है. इस परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसकी निश्चित जानकारी किसी के पास नहीं है. 75 वर्षीय बुजुर्ग विश्वनाथ सिंह बताते हैं कि उनके स्मरण से भी पहले से यह परंपरा चली आ रही है और पीढ़ियों से ग्रामीण पूरी श्रद्धा के साथ इसका निर्वहन करते आ रहे हैं।
परंपरा के अनुसार गांव से नकारात्मक शक्तियों, रोग-दुख और नुकसानदायक तत्वों को दूर करने की धार्मिक मान्यता के तहत विशेष अनुष्ठान किया जाता है. पंडित द्वारा मंत्रों से सिद्ध किए गए चावल को गांव का एक युवक दोनों मुट्ठियों में लेकर पूरे गांव की परिक्रमा करता है. परिक्रमा के दौरान उसे उफनती पुनपुन नदी को दो बार तैरकर पार करना पड़ता है. इसके बाद वह वापस लौटकर चावल पंडित को सौंपता है. पिछले सात वर्षों से करीब 25 वर्षीय गौरव कुमार यह परंपरागत जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं।
गौरव के गांव की परिक्रमा पूरी करने तक मंदिर परिसर में सामूहिक हवन चलता रहता है. इसके बाद मंत्रोच्चारण के बीच गांव की सीमा पर एक जोड़ा कबूतर उड़ाया जाता है. इस वर्ष यह परंपरा राहुल कुमार उर्फ बम भोले और प्रिंस कुमार ने निभाई. ग्रामीणों की मान्यता है कि इस धार्मिक अनुष्ठान से गांव में सुख-शांति बनी रहती है और रोग-दुख दूर होते हैं।
पूरे पूजा कार्यक्रम को वैदिक मंत्रों के साथ मुख्य पुजारी बब्लू कुमार पांडे ने संपन्न कराया. उन्होंने बताया कि वह करीब 25 वर्षों से मंदिर में मुख्य पुजारी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. उनसे पहले उनकी चार पीढ़ियां इसी मंदिर में पूजा-अर्चना कराती रही हैं. उन्होंने कहा कि फतेहपुर के लोगों की आस्था और मां भगवती की कृपा से यह परंपरा आज भी निरंतर चली आ रही है। ग्रामीणों के मुताबिक सावन के पूरे महीने पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालु सात्विक भोजन करते हैं और शारीरिक व मानसिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखते हैं. पूजा के दौरान श्रद्धालुओं ने गांव की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की।
