पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) बिहार के ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने के लिए लागू किया गया आयुष्मान आरोग्य मंदिर मॉडल अब देश के लिए एक अनुकरणीय मिसाल बनता दिख रहा है। चौखट पर गुणवत्तापूर्ण इलाज, निशुल्क दवा और त्वरित जांच की त्रिस्तरीय रणनीति ने राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। राज्य स्वास्थ्य समिति की उच्चस्तरीय समीक्षा में इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि सुदूर अंचलों में भी स्वास्थ्य सेवाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे ग्रामीणों तक पहुंच रही हैं।
सिर्फ अगस्त माह में ही 44.71 लाख से अधिक लोगों का ओपीडी परामर्श लेना इस अभिनव प्रयोग की जमीनी स्वीकार्यता और सफलता को रेखांकित करता है। कार्यपालक निदेशक की अध्यक्षता में हुई समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया कि निरंतर डिजिटल मॉनिटरिंग और सुलभ आपूर्ति शृंखला से यह स्वास्थ्य नवाचार अब अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की जीवनरेखा बन चुका है। राज्य में संचालित 10 हजार 472 आरोग्य मंदिरों को केवल उपचार केंद्र नहीं, बल्कि संपूर्ण वेलनेस हब के तौर पर विकसित किया गया है। इससे ग्रामीणों को छोटी-मोटी बीमारियों और प्रारंभिक पैथोलॉजी जांच के लिए शहर जाने की मजबूरी से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है।
ओपीडी लक्ष्य साधने में रोहतास और मुजफ्फरपुर बने स्टेट मॉडल
स्वास्थ्य उपकेंद्र स्तर पर प्रति एक हजार की आबादी पर हर महीने 60 मरीजों की ओपीडी सुनिश्चित करने के विभाग द्वारा कड़े मानक तय किए गए हैं। इस मानक को हासिल करने में रोहतास और मुजफ्फरपुर जिले राज्य के लिए रोल मॉडल बनकर उभरे हैं, जहां 89-89 फीसदी केंद्रों ने इस लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल किया। मुजफ्फरपुर में अकेले अगस्त माह में 2.66 लाख से अधिक मरीजों ने परामर्श लिया। वहीं खगड़िया में 88 फीसदी, लखीसराय में 83 फीसदी और शेखपुरा में 78 फीसदी केंद्रों ने इस मानक को पूरा किया। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर सुपौल 70 फीसदी और वैशाली 69 फीसदी उपलब्धि के साथ पूरे राज्य में अग्रणी रहे। यह प्रदर्शन स्पष्ट करता है कि प्रशिक्षित सीएचओ और स्वास्थ्य कर्मियों की नियमित तैनाती ने संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बेहद आसान बना दिया है।
86 फीसदी दवा उपलब्धता: आपूर्ति शृंखला प्रबंधन का सफल उदाहरण
ग्रामीणों की जेब पर पड़ने वाले दवा खर्च को शून्य करने के लिए बनाई गई अनिवार्य औषधि सूची (ईडीएल) की मॉनिटरिंग व्यवस्था बेहद असरदार साबित हो रही है। उपकेंद्र स्तर पर निर्धारित 147 दवाओं में से औसतन 126 दवाएं (86 फीसदी) हर समय स्टॉक में उपलब्ध हैं। बेगूसराय 96 फीसदी और रोहतास 95 फीसदी दवा उपलब्धता के साथ सर्वोत्तम आपूर्ति प्रबंधन का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुजफ्फरपुर, गया, सुपौल और मुंगेर जैसे जिलों में भी 90 फीसदी से अधिक दवाएं निरंतर उपलब्ध पाई गईं। दवाओं के वितरण में पारदर्शिता और गति का ही नतीजा है कि गया में 75 फीसदी और गोपालगंज में 74 फीसदी मरीजों को परामर्श के साथ ही जरूरी दवाएं तुरंत मुहैया कराई गईं।
मुजफ्फरपुर व पश्चिम चंपारण में 99 फीसदी जांच: प्वाइंट-ऑफ-केयर टेस्टिंग का कमाल
बीमारी का सही और तुरंत पता लगाने के लिए उपकेंद्र स्तर पर शुरू की गई ‘प्वाइंट-ऑफ-केयर’ जांच व्यवस्था एक क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। 14 अनिवार्य बुनियादी जांचों की सुविधा में मुजफ्फरपुर 99 फीसदी और पश्चिम चंपारण 98 फीसदी की उपलब्धता के साथ राज्य में शीर्ष पर रहे। समस्तीपुर, मुंगेर और नवादा ने भी 95 फीसदी से अधिक जांच उपलब्धता दर्ज कराई। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 63 प्रकार की उन्नत जांचों के मामले में वैशाली (99 फीसदी) और सीतामढ़ी (97 फीसदी) ने निजी पैथोलॉजी केंद्रों पर ग्रामीणों की निर्भरता को लगभग समाप्त कर दिया है। त्वरित जांच और सटीक इलाज की इस कार्यपद्धति से रोग की जटिलता को प्राथमिक स्तर पर ही नियंत्रित किया जा रहा है।
योग, वेलनेस और जन-भागीदारी से स्वस्थ समाज की टिकाऊ नींव
इलाज से आगे बढ़कर ‘बीमार ही न पड़ने’ की सोच को बढ़ावा देना इस मॉडल का सबसे बड़ा नवाचार है। इसके तहत हर केंद्र पर महीने में कम से कम 10 योग और वेलनेस सत्र अनिवार्य किए गए हैं। पूर्णिया और शेखपुरा जिलों ने 97-97 फीसदी केंद्रों पर नियमित वेलनेस सत्र आयोजित कर इसे एक जन-आंदोलन का रूप दे दिया है। सहरसा में 93 फीसदी और खगड़िया में 90 फीसदी केंद्रों पर ग्रामीणों को नियमित प्राणायाम और सेहतमंद जीवनशैली से जोड़ा गया। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर शासन और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 96 फीसदी केंद्रों पर जन आरोग्य समितियों का गठन पूरा कर लिया गया है, जिससे स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन में समुदाय की सीधी भागीदारी सुनिश्चित हो रही है।
