बिहार

एम्स पटना में पहली बार बोन कंडक्शन इम्प्लांट सर्जरी सफल, एक दिन में तीन जटिल ऑपरेशन

फुलवारी शरीफ, अजीत : एम्स पटना के नाक, कान एवं गला (ईएनटी) विभाग ने चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है. विभाग ने पहली बार बोन कंडक्शन इम्प्लांट सर्जरी सफलतापूर्वक की है. 30 अक्टूबर को एक छोटे बच्चे का यह ऑपरेशन किया गया, जिसके जन्म से ही दोनों बाहरी कान नहीं थे. चिकित्सा भाषा में इस स्थिति को बाइलेटरल एनोटिया कहा जाता है.

खास बात यह रही कि इसी दिन विभाग की टीम ने दो अन्य जटिल कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी भी सफलतापूर्वक कीं. इनमें एक बच्चा और एक वयस्क शामिल थे. तीनों सर्जरी का नेतृत्व डॉ. क्रांति भावना ने किया. इसमें वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. राजेश विश्वकर्मा का मार्गदर्शन और सहयोग मिला. इस उपलब्धि के साथ एम्स पटना के हियरिंग इम्प्लांट कार्यक्रम ने 400 से अधिक इम्प्लांट सर्जरी का आंकड़ा पार कर लिया है.

चिकित्सकों के अनुसार, बोन कंडक्शन इम्प्लांट तकनीक उन मरीजों के लिए उपयोगी है, जिनके बाहरी कान या कान की नली में जन्मजात कमी अथवा समस्या होती है. इसमें खोपड़ी की हड्डियों के माध्यम से आवाज अंदरूनी कान तक पहुंचाई जाती है. वहीं कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के जरिये आवाज को विद्युत संकेतों में बदलकर सुनने की नस तक पहुंचाया जाता है. दोनों तकनीकों का इस्तेमाल मरीज की जांच और सुनने की क्षमता के आकलन के आधार पर किया जाता है.

बोन कंडक्शन इम्प्लांट सर्जरी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत की गई. चिकित्सकों ने बताया कि बच्चों में सुनने की समस्या की समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है. सर्जरी के बाद नियमित जांच, स्पीच थेरेपी और अभिभावकों का सहयोग बच्चों की सुनने, समझने और बोलने की क्षमता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

इस अवसर पर ईएनटी विभाग की ओर से ‘हियरिंग सॉल्यूशंस’ विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम भी आयोजित किया गया. इसमें डॉ. क्रांति भावना, अतिथि विशेषज्ञ डॉ. राजेश विश्वकर्मा और डॉ. लीना विश्वकर्मा ने सुनने से जुड़ी समस्याओं और उनके आधुनिक उपचार पर जानकारी साझा की. कार्यक्रम में नई इम्प्लांट तकनीकों और चिकित्सा क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर भी चर्चा हुई.

विभाग ने इस उपलब्धि में सहयोग के लिए एम्स पटना की ऑडियोलॉजी टीम और एमईडी-ईएल इंडिया की भूमिका की सराहना की. यह उपलब्धि जन्मजात सुनने की समस्या से जूझ रहे बच्चों को आधुनिक उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.

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