बिहार

हर दिन जन्म लेने वाले 20 फीसदी नवजात होते हैं किसी न किसी रोग के शिकार

अररिया(रंजीत ठाकुर): नवजात की मौत संबंधी अधिकांश मामले प्रसव व इसके 24 घंटे के अंदर घटित होते हैं। नवजात शिशुओं की मृत्यु के प्रमुख कारणों में समय पूर्व प्रसव, नवजात का संक्रमित होना, प्रसव के दौरान दम घुटना जन्मजात विकृतियां सहित अन्य कारण जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा सही पोषण का अभाव, कम उम्र में शादी, एएनसी जांच में अनदेखी सहित कई अन्य वजहों से नवजात जन्मजात विकार के साथ ही पैदा होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर दिन पैदा होने वाले लगभग 20 फीसदी नवजात किसी न किसी रोग से पीड़ित होते हैं। ऐसे बीमार बच्चों के लिये सदर अस्पताल में संचालित स्पेशल न्यू बॉर्न केअर यूनिट यानि एसएनसीयू बेहद मददगार साबित हो रहा है। सदर अस्पताल में हर दिन औसतन जन्म लेने वाले 30 बच्चों में पांच बच्चे किसी न किसी रूप से बीमार होते हैं। इन बीमार बच्चों के इलाज में एसएनसीयू बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।

मुश्किल है रोगग्रस्त नवजात की पहचान :

सदर अस्पताल के अधीक्षक डॉ जीतेंद्र प्रसाद ने बताया कि नवजात में किसी तरह के रोग का पता लगाना मुश्किल होता है। जन्म के उपरांत बच्चे के वजन, आकार, आव-भाव, हरकतों व लक्षणों के आधार पर रोगग्रस्त बच्चों की पहचान की जाती है। जन्म के तुरंत बाद बच्चे का नहीं रोना, शरीर व हाथ-पांव का रंग पीला होना, हाथ-पांव का ठंडा होना। मां का दूध नहीं पीना, बहुत ज्यादा रोना या बहुत ज्यादा सुस्त होना, चमकी, नवजात का वजन तय मानक से कम या अधिक होना, समय से पूर्व बच्चे का जन्म, कटे तालु व होंठ सहित कई अन्य लक्षणों के आधार पर रोगग्रस्त नवजात की पहचान की जाती है। प्रसव वार्ड में तैनात चिकित्सक ही नहीं बहुत सारी एएनएम व जीएनएम भी बाल रोगों की पहचान में बेहद दक्ष होती हैं। उन्हें इसके लिये साखतौर पर प्रशिक्षित किया गया है। नवजात में रोग की पहचान होने के तत्काल बाद उसे एसएनसीयू में भेजा जाता है। आम लोगों को इसकी सेवाएं मुफ्त में उपलब्ध है। जबकि इसी सेवा के लिये प्राइवेट क्लिनिकों में काफी खर्च आता है।

जरूरी आधुनिक सुविधाओं से लैस है एसएनसीयू :

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अस्पताल प्रबंधक विकास आनंद ने बताया कि नवजात रोगग्रस्त होने पर उसे एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है। नवजात को 24 से 48 घंटे प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी व चिकित्सक की देखरेख रखा जाता है। इस दौरान नवजात की विशेष निगरानी रखी जाती है। उन्होंने बताया कि एसएनसीयू में रेडियो वॉर्मर, ऑक्सीजन की सुविधा, फोटो थैरेपी जो जॉन्डिस पीड़ित बच्चों के लिये महत्वपूर्ण है। नवजात के लिये डाइपर, सक्शन मशीन सहित अन्य सुविधाएं मौजूद हैं। एसएनसीयू में अपने बच्चे का इलाज करा रही परमिला बेगम ने बताया उनका पोता जन्म लेने के बाद रोया तक नहीं। शरीर में कोई हलचल भी नहीं थी। हम तो हताश हो चुके थे। बच्चे को एसएनसीयू ले जाया गया। जहां महज एक घंटे के बाद बच्चा रो भी रहा था और मां का दूध पीने की कोशिश भी करने लगा था।

नवजात का 24 से 48 घंटे तक विशेष निगरानी में रहना जरूरी:

सिविल सर्जन अररिया विधानचंद्र सिंह ने बताया कि एसएनसीयू बीमार नवजात को जीवनदान देने में सक्षम है। बहुत से लोग इसका लाभ भी उठा रहे हैं। लेकिन कुछ लोग हैं जो नवजात की बीमारी से परेशान होकर इधर-उधर भटक कर अपना व अपने नवजात को नुकसान पहुंचाते हैं। एसएनसीयू में सारी सेवाएं नि:शुल्क हैं। बीमार नवजात का एसएनसीयू में 24 से 48 घंटे तक विशेष चिकित्सकीय देखरेख में रहना जरूरी है।

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