बिहार

आरपीएम कॉलेज में अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की शहादत पर याद किया

पटनासिटी(न्यूज क्राइम 24): आरपीएम कॉलेज पटना सिटी के हिंदी विभाग में अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की शहादत को याद करते हुए शहीद दिवस मनाया गया। कार्यक्रम का आरंभ विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉक्टर शिव चंद्र सिंह एवं मुख्य अतिथि एआईएसएफ के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव एवं बिहार के प्रांतीय सचिव कामरेड विश्वजीत कुमार ने शहीदे आजम भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया।

मुख्य वक्ता विश्वजीत जी ने कवि शैलेंद्र की कविता ‘फांसी का फंदा झूल गया भगत सिंह मरदाना । दुनिया को सबक दे गया भगत सिंह मरदाना ।। को उल्लेखित करते हुए कहा कि हम आज आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं मगर जिस आजादी का सपना भगत सिंह एवं उनके साथियों ने देखा था, उस सपने के भारत को पाना अभी बाकी है । शहीदे आजम भगत सिंह का जीवन, दर्शन एवं देश के प्रति उनका उत्तम बलिदान देश के युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत है।

आजादी के बाद राजनीति एवं समाज में बुराइयां आ गई है । देश में विषमता की खाई बढ़ते जा रही है। खाई को पाटे बिना समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकती है । देश के युवाओं में आज असंतोष एवं आक्रोश है। बावजूद या तो उनमें निष्क्रियता है या वे पलायनवादी हैं या सुविधा भोगी बन रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शिवचंद्र सिंह ने भगत सिंह एवं उनके साथ शहीद हुए राजगुरु, सुखदेव एवं अन्य क्रान्तिकारियों के जीवन एवं उनके कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये लोग हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े हुए उग्र विचारधारा के क्रांतिकारी थे।

इन क्रांतिकारियों से अंग्रेजी सत्ता डरी सहमी रहती थी। इस संगठन के क्रांतिकारी जब भी पकड़ में आते थे बिना देर लगाए अंग्रेजी सत्ता इनको किसी न किसी षड्यंत्र में फंसा कर फांसी के फंदे तक पहुंचा देती थी या तथाकथित मुठभेड़ दिखाकर इनका काम तमाम कर देती थी। भगत सिंह राजगुरु एवं सुखदेव को असेंबली में बम फेंकने के आरोप में बंदी बनाया गया था । आरोप सिद्ध नहीं हुआ फिर भी इनके लिए 24 मार्च 1931 को फांसी देने की तारीख तय हो गई।

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मगर भगत सिंह के प्रति व्यापक जन समर्थन को देखते हुए अंग्रेजी सत्ता इतनी दहल गई थी कि उन्हें अंदेशा हो गया था कि अगर भगत सिंह को तय तारीख एवं समय पर फांसी दी जाएगी तो इनके समर्थन में उमड़े जनसैलाब को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए उनको तय तिथि से 1 दिन पहले २३ मार्च 1931 को ही फांसी दे दी गई । उनकी लाश को रात में हीं नष्ट कर देने का जघन्य कृत्य किया गया, यह भी बताया की भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को अगर उस समय देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस का थोड़ा सा भी नैतिक समर्थन मिल गया होता तो देश को आजाद होने के लिए 1947 तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

देश की तस्वीर भी कुछ और होती। छात्रा आर्या कुमारी एवं रितिका ने भी संबोधित किया। हिंदी प्रतिष्ठा पार्ट थर्ड की छात्रा सुश्री रितिका को भगत सिंह के जीवन दर्शन पर प्रभावशाली उद्बोधन के लिए पुरस्कृत किया गया। सामाजिक कार्यकर्ता मोनित राज ने भगत सिंह एवं अन्य क्रान्तिकारियों के ऊपर बनाए गए पोस्टर के द्वारा की उनके क्रांतिकारी विचारों से छात्राओं को अवगत कराया।

हिंदी विभागाध्यक्ष ने मुख्य अतिथि सह मुख्य वक्ता को अंग वस्त्र एवं स्वयं संपादित पत्रिका” विभाषा संस्कृति” का “आज़ादी का अमृत महोत्सव ” 2022 विशेषांक एवं अपनी लिखी पुस्तक “हिंदी साहित्य दिग्दर्शन ” तथा किन्नर जीवन पर आधारित लघु पुस्तिका ” हिजड़ा : मैं वा तू ! “को प्रदान कर उनका स्वागत किया। संचालन सुश्री बरखा सागर एवं धन्यवाद ज्ञापन सुश्री मोनी कुमारी ने किया।

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