बिहार

महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है

बिहार, सोना कुमारी : समाज में सबसे पहले लड़कियों और लड़कों में भेदभाव कहाँ होता है? महिलाओं का शोषण कहाँ से शुरू होता है? इन्ही सवालों के उत्तर खोजने की कोशिस में हम पाते हैं कि कई बार इसकी शुरुआत अपने घर से ही होती है। अमूमन एक माँ ही अपनी बेटी और बेटे के बीच भेदभाव करने लगती है। लड़कियों से कहा जाता है कि वह घर के काम में हाथ बटाए, झाड़ू पोछा कर दिया करें, खाना बनाए, घर के सारे काम में हाथ बटाए इसके साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी करे। उसे बाहर जाने पर रोक लगा दी जाती है। ज़्यादा बोलने पर कहा जाता है कि लड़की होकर ज़ुबान लड़ा रही है। किसी लड़के से बात करने पर उसे कमरे में बंद कर दिया जाता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर दी जाती है। वहीं, लड़कों को समय पर खाना मिलता है, वे रात में बाहर घूमते और लड़कियों से बात करते है, लेकिन उनसे सवाल तक नहीं किया जाता कि वह कहां जा रहे हैं और क्या कर रहे है।

आखिर ऐसा भेदभाव क्यों? क्या लड़कियों की आज़ादी, उनकी पसंद और उनकी इच्छाओं का कोई महत्व नहीं ?
लेकिन यहाँ एक सवाल और उठता है क्या हर माँ इसके लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है? शायद नहीं। कई बार माँ भी उसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा होती है, जहाँ उसने स्वयं भेदभाव सहा होता है। कभी पिता के द्वारा, तो कभी पति के द्वारा।घरेलू हिंसा, अपमान नियंत्रण और शारीरिक शोषण जैसी परिस्थितियों से गुज़रने वाली महिलाओं को भी समानता और सम्मान नहीं मिल पाता। जब एक महिला स्वयं अन्याय सहती है, तब भी कभी-कभी वही परंपराएँ अपनी बेटी पर लागू कर देती है, जिन्हें उसने अपनी ज़िंदगी में झेला होता है।

जब महिलाएँ इस शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाती है, तो कई बार उन्हें समाज के विरोध और हिंसा का सामना करना पड़ता है। फूलन देवी का जीवन भी सामाजिक अन्याय और हिंसा के संदर्भ में चर्चा में रहा है।बचपन में उनके साथ यौन शोषण हुआ और आगे चलकर उन्हें जातिगत तथा लैंगिक हिंसा का भी सामना करना पड़ा। वर्ष 1981 में बेहमई हत्याकांड हुआ, जिसमें कई लोगों की हत्या की हुई। उनका जीवन इस बात पर विचार करने के लिए मजबूर करता है कि जब समाज में महिलाओं को न्याय और सुरक्षा नहीं मिलती, तो अन्याय के परिणाम कितने गंभीर हो सकते है। हालाँकि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।महिलाओं और बच्चों को शोषण से बचाने के लिए कई कानून बनाए गए है।

इनमें अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956, भारतीय न्याय संहिता बीएनस 2023, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 और कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष अधिनियम, 2013 शामिल है। इन कानूनों का उद्देश्य अलग-अलग प्रकार के शोषण को रोकना पीड़ितों को संरक्षण देना और न्याय उपलब्ध कराने में सहायता करना है। लेकिन केवल कानून बना देने से समाज में भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता। इसके लिए लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाना भी ज़रूरी है।

इस बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। माँ-बाप को समझना होगा कि घर का काम केवल लड़कियों की ज़िम्मेदारी नहीं है। लड़कों को भी खाना बनाना, सफ़ाई करना और घर के दूसरे काम करना सिखाया जाना चाहिए। लड़कियों को भी उतनी ही स्वतंत्रता शिक्षा, सम्मान और अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए, जितना लड़कों को मिलता है।अगर हम चाहते है कि भविष्य में किसी दूसरी लड़की का शोषण न हो, तो हमें आज ही अपने घरों में समानता की नींव रखनी होगी। बच्चों को बचपन से सिखाना होगा कि किसी का लड़की या लड़का होना उसकी स्वतंत्रता, अधिकारों और सम्मान को तय नहीं करता।क्योंकि महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है सोच बदलना भी ज़रूरी है। और इस बदलाव की शुरुआत किसी और से नहीं बल्कि अपने घर से करनी होगी।

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