बिहार

गर्भावस्था के दौरान एनीमिया का कुशल प्रबंधन व उपचार जरूरी

 अररिया, रंजीत ठाकुर।  किसी महिला के लिये गर्भावस्था से लेकर मां बनने तक का समय काफी महत्वपूर्ण होता है। ये वो समय होता है, जब गर्भस्थ शिशु के समुचित शारीरिक व मानसिक विकास की नींव तैयार होती है। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य व सुरक्षित प्रसव के लिहाज से भी ये समय काफी महत्वपूर्ण है। इसलिये गर्भवती महिलाओं का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है. क्योंकि उनका खान-पान से लेकर शारीरिक गतिविधि व दिनचर्या का सीधा असर सीधे गर्भ में पल रहे उनके शिशु पर पड़ता है. गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास व प्रसव के दौरान होने वाले रक्त स्त्राव के कुशल प्रबंधन के लिये गर्भवती महिला के शरीर में पर्याप्त मात्रा में खून रहना जरूरी है. इसके लिये एनीमिया का कुशल प्रबंधन महत्वपूर्ण है. एनीमिया प्रबंधन के लिये नियमित अंतराल पर प्रसव पूर्व जांच आवश्यक है. जो सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देता है.

एनीमिया के कुशल प्रबंधन के प्रति विभाग गंभीर

जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ मोईज ने बताया कि एनीमिक महिलाओं को तीन श्रेणियों में रखा जाता है. खून में हेमोग्लोबिन का स्तर 10 से 10.9 ग्राम होने पर इसे माइल्ड एनीमिया, हेमोग्लोबिन का स्तर 07 ग्राम से 9.9 ग्राम के बीच होने पर इसे मॉडरेट एनीमिया व हेमोग्लोबिन का स्तर 07 ग्राम से कम होने पर इसे सीवियर एनीमिया श्रेणी में रखा जाता है. एनीमिया के कुशल प्रबंधन को लेकर स्वास्थ्य विभाग एनीमिया मुक्त भारत अभियान के सफल क्रियान्वयन के प्रति संकल्पित है. इसके लिये स्वास्थ्य, शिक्षा व आईसीडीएस विभाग के साथ आपसी समन्वय को बेहतर विभिन्न स्तरों पर लोगों को एनीमिया से बचाव संबंधी उपायों के प्रति जागरूक किया जा रहा है. आंगनबाड़ी केंद्र व विद्यालयों के माध्यम से विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों को आईएफए के निर्धारित डोज का सेवन कराया जाता है. वहीं गर्भवती महिलाओं को भी संबंधित दवा सरकारी चिकित्सा संस्थानों के माध्यम से नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाता है.

सीवियर एनीमिया की रिपोर्टिंग व उपचार पर विशेष जोर

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डीपीएम संतोष कुमार ने बताया कि एनीमिया के कुशल प्रबंधन पर विभागीय स्तर से विशेष ध्यान दिया जा रहा है. सीवियर एनीमिया से संबंधित मामलों की रिर्पोटिंग व उपचार विभाग की प्रमुखताओं में शामिल है. बीते फरवरी माह में विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं में सीवियर एनीमिया के कुल 68 मामले चिह्नित किये गये. इसमें 52 महिलाओं का सफल उपचार सरकारी चिकित्सा संस्थान के माध्मय से संपन्न कराया गया.

एनीमिया के दुष्प्रभाव से बचाव के लिये प्रसव पूर्व चार जांच जरूरी

एनीमिया के कारण मां व नवजात दोनों के लिये प्रसवकालीन जोखिम काफी बढ़ जाता है. जो नवजात शिशु के मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है. गर्भस्थ शिशु का समुचित विकास प्रभावित होता है. जन्म के समय शिशु का वजन कम होने के साथ समय से पूर्व प्रसव की संभावना काफी बढ़ जाती है. हल्के व मध्यम एनीमिया का लक्षणों के आधार पर पता लगाना मुश्किल होता है. इसका पता केवल जांच से ही संभव है. वहीं जैसे जैसे एनीमिया बढ़ता है. गर्भवती महिलाओं में थकान, चिड़चिड़ापन, कमजोरी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खरास, त्वचा व नाखून के रंग में बदलाव, पैरों में सूजन जैसे लक्षण दिखते हैं. उन्होंने कहा कि एनीमिया के दुष्प्रभाव से बचने के लिये प्रसव पूर्व चार जांच जरूरी है. ये प्रसव संबंधी जटिलताओं को कम करने के साथ-साथ जच्चा-बच्चा की सेहत व सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी है। इसे लेकर विभागीय स्तर से ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता व पोषण दिवस, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत विशेष अभियान संचालित है। सामुदायिक स्तर पर गर्भवती महिलाओं को बेहतर खान-पान के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

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