पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) स्वावास्थ्य के लिए साथ आएं, विज्ञान का साथ निभाएं। विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की इस वैश्विक थीम को एम्स पटना ने केवल संदेश तक सीमित नहीं रखा बल्कि इसे ज़मीनी स्तर पर उतारते हुए एक सशक्त पहल में बदल दिया। समुदाय और परिवार चिकित्सा विभाग, एम्स पटना ने इस दिन को जन-जागरूकता, वैज्ञानिक संवाद और स्वास्थ्य सेवा के संगम के रूप में प्रस्तुत किया।
इसी कड़ी में खगौल और नौबतपुर (पटना) के क्षेत्रीय अभ्यास क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविरों और जागरूकता अभियानों का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों का मुख्य फोकस था एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और वन हेल्थ अप्रोच। इस पहल ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि मनुष्य, पशु और पर्यावरण तीनों का स्वास्थ्य एक दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वच्छता पखवाड़ा के अंतर्गत स्वच्छता और व्यक्तिगत साफ सफाई के महत्व पर भी विशेष जोर दिया गया। ग्रामीणों ने न केवल इस पहल में भाग लिया बल्कि सक्रिय रूप से संवाद किया, स्वास्थ्य जांच कराई और दवाओं के जिम्मेदार उपयोग के बारे में जानकारी प्राप्त की।
दूसरे चरण में चिकित्सा छात्रों के लिए एक सीएमई सत्र आयोजित किया गया, जिसका विषय था जलवायु परिवर्तन और उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल (कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ), प्रो. (डॉ.) अनुप कुमार (चिकित्सा अधीक्षक) और प्रो. (डॉ.) संजय पांडेय (विभागाध्यक्ष, समुदाय एवं परिवार चिकित्सा) ने की।
इस अवसर पर WHO के राज्य एनटीडी समन्वयक डॉ. राजेश पांडेय और यूनिसेफ के कार्यक्रम अधिकारी डॉ. निर्भय मिश्रा ने अपने विचार साझा किए। डॉ. राजेश पांडेय ने बताया कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में काला-आजार, लसीका फाइलेरिया, कुष्ठ रोग और डेंगू जैसे रोग अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं, खासकर बिहार और पूर्वी भारत में। वहीं डॉ. निर्भय मिश्रा ने बताया कि जलवायु परिवर्तन जैसे बढ़ता तापमान, बाढ़ और सूखा मच्छरों और सैंडफ्लाई जैसे वाहकों की संख्या बढ़ा रहा है, जिससे इन रोगों का खतरा और बढ़ रहा है, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के लिए। कार्यक्रम का समापन डॉ. शिबाजी देबबर्मा (सहायक प्रोफेसर) द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। गांवों से लेकर कक्षाओं तक, इस आयोजन ने यह साबित किया कि स्वास्थ्य केवल इलाज नहीं, बल्कि जागरूकता, विज्ञान और सामूहिक जिम्मेदारी का परिणाम है क्योंकि जब विज्ञान समाज के साथ खड़ा होता है तब स्वास्थ्य एक अधिकार नहीं एक सशक्त वास्तविकता बन जाता है।
