पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) महिलाओं के पोषण की जरूरत उनके बढ़ते उम्र के अनुसार बदलती रहती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, महिलाओं और किशोरियों में आयरन की कमी दुनिया की सबसे आम पोषण समस्याओं में से एक है और इसका सीधा असर मातृ और शिशु स्वास्थ्य पर पड़ता है। डब्लूएचओ अपने वैश्विक पोषण दिशा-निर्देशों में कहता है कि महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया को कम करना केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, यह सुरक्षित गर्भावस्था, शिशु के विकास और महिलाओं की कार्यक्षमता से सीधे जुड़ा है।
किशोरियां पोषण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी किशोरावस्था महिलाओं के जीवन का सबसे संवेदनशील पोषण चरण है।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कम्यूनिटी मेडिसन एण्ड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में 15–19 वर्ष की किशोरियों में आयरन की कमी और एनीमिया की दर लड़कों की तुलना में कहीं अधिक पाई गई है। अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि इस कमी के पीछे सीमित आहार, भोजन में विविधता की कमी और पोषण संबंधी जानकारी का अभाव प्रमुख कारण हैं। पटना जिले की 18 वर्षीय शालू कुमारी ( बदला हुआ नाम ) कहती हैं कि खाने में रोज़ वही चावल-दाल मिलती है। आयरन की गोली भी मिलती है, लेकिन इससे शरीर में क्या फर्क पड़ता है, यह हमें बेहतर तरीके से मालूम नहीं है।
प्रजनन आयु और मातृत्व का दबाव
पटना एम्स की एडिशनल प्रोफेसर, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग, डॉ. इंदिरा प्रसाद बताती हैं कि महिलाओं की पोषण आवश्यकता हर उम्र में अलग-अलग होती है। किशोरावस्था में विटामिन A, D और B12 की कमी से एनीमिया, कमजोर हड्डियां और विकास रुकने की समस्या सामने आती है। 20 से 35 वर्ष की महिलाओं में यही विटामिन प्रजनन स्वास्थ्य, हार्मोन संतुलन और स्वस्थ गर्भधारण के लिए बेहद जरूरी होते हैं। गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान विटामिन D और B12 की कमी मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डालती है। वहीं 40 वर्ष के बाद और रजोनिवृत्ति के समय विटामिन D, E और B12 हड्डियों की मजबूती, नसों के स्वास्थ्य और हार्मोनल बदलाव से जुड़ी परेशानियों को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए महिलाओं के लिए उम्र के अनुसार विटामिन सप्लीमेंट और संतुलित आहार को स्वास्थ्य सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
सीतामढ़ी जिले की 26 वर्षीय गर्भवती महिला सुनीता बताती हैं कि डॉक्टर ने कहा कि खून कम है। आंगनवाड़ी से जो मिलता है, उसी पर निर्भर रहना पड़ता है। घर में अलग से मेरे लिए पोषक खाना बन पाना मुश्किल होता है।
बेहतर पोषण हर मायने में जरूरी
यूनिसेफ अपनी वैश्विक रिपोर्ट ‘अन्डरनरिशड एवं ओवरलूक्ड’ में साफ कहता है कि किशोरियों और महिलाओं का पोषण लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया है, जबकि इसका असर पूरी पीढ़ी पर पड़ता है। महिलाओं और किशोरियों का खराब पोषण केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य की समस्या नहीं है। यह बच्चों के जन्म-वजन, विकास, शिक्षा और भविष्य की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। यूनिसेफ यह भी रेखांकित करता है कि गर्भावस्था से पहले और दौरान सही पोषण न मिलने पर एनीमिया, समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले शिशुओं का खतरा बढ़ जाता है, जो बिहार जैसे राज्यों के लिए बड़ी चुनौती है।
व्यवहार बदलाव जरूरी है
एम्स की डॉ. मोनिका अनंत कहती हैं कि बिहार में पोषण पखवाड़ा, एनीमिया मुक्त भारत अभियान और आंगनवाड़ी सेवाओं के जरिए महिलाओं तक पोषण पहुंचाने की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अध्ययनों का संकेत है कि केवल सप्लीमेंट या राशन वितरण से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक उम्र-विशेष के अनुसार पोषण, भोजन की विविधता और व्यवहार में बदलाव पर फोकस नहीं किया जाएगा, तब तक स्थिति में ठोस सुधार मुश्किल है। पोषण कार्यक्रम तब प्रभावी होते हैं, जब वे महिलाओं के पूरे जीवन-चक्र को ध्यान में रखकर बनाए जाएं यानि किशोरावस्था से लेकर मातृत्व तक।
