फुलवारीशरीफ, अजीत। पटना जिला के संपतचक निवासी 95 वर्षीय वयोवृद्ध समाजसेवी सुखदेव बाबू ने फिर एक नई मिसाल पेश की है. यूनिसेफ के “मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस” कार्यक्रम के तहत उनके प्रयासों से गुजरात के आणद जिले स्थित “भारोदा प्राइमरी स्कूल” अब दिव्यांग बच्चों के लिए सुलभ और समावेशी शिक्षा का आदर्श केंद्र बन गया है।
पहले जहां इस स्कूल में दिव्यांग छात्रों के लिए रैंप, रेलिंग या शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं थीं, वहीं अब सुखदेव बाबू की प्रेरक पहल और यूनिसेफ के सहयोग से विद्यालय परिसर पूरी तरह दिव्यांग-अनुकूल बन चुका है. यहाँ रैंप, रेलिंग, स्पर्शनीय (टैक्टाइल) पेवर्स और सुलभ शौचालय जैसी जरूरी सुविधाएँ स्थापित की गई हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन बच्चों पर पड़ा है जो पहले शारीरिक सीमाओं के कारण शिक्षा से वंचित थे. आणद जिले के एक छोटे गाँव में रहने वाला 6 वर्षीय दिव्यांग बालक महावीर अब न सिर्फ स्कूल जा पा रहा है, बल्कि अन्य बच्चों की तरह खेलता और मुस्कुराता भी है। यूनिसेफ इंडिया ने सुखदेव बाबू के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि “सुखदेव बाबू जैसे संवेदनशील और जागरूक नागरिक समाज में असली परिवर्तन के प्रेरणास्त्रोत हैं. उनका योगदान प्रशंसनीय और प्रेरणादायक है।
95 वर्षीय सुखदेव बाबू को इससे पहले सर्वोच्च मानवाधिकार संरक्षण सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है. वे माता सावित्रीबाई फुले के आदर्शों पर संचालित मिशन नौनिहाल सम्मान के संस्थापक-संरक्षक और यूनिसेफ के स्थायी सहयोगी सदस्य भी हैं। उनका मानना है कि “हर बच्चे को गरिमा के साथ जीने और पढ़ने का अधिकार है. वक्त आ गया है कि समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए।
यूनिसेफ का “मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस” कार्यक्रम गुजरात के सैकड़ों विद्यालयों को दिव्यांग और समावेशी शिक्षा के अनुकूल बना रहा है. इससे पहले भी सुखदेव बाबू को छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्रप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्यों में सहयोग एवं सकारात्मक भूमिका के लिए यूनिसेफ द्वारा सराहना मिल चुकी है।
