बिहार

राजधर्म बड़ा है या गठबंधन धर्म? सत्ता चलाना लक्ष्य है या जनता को न्याय देना?

फुलवारीशरीफ, अजित। प्रख्यात शिक्षाविद्, पर्यावरणविद् एवं भारतीय लोक हित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरुदेव श्री प्रेम, जो संपतचक स्थित बैरिया में प्रेम लोक मिशन स्कूल संचालित करते हैं, ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखते हुए पूछा है कि देश के हित में प्रधानमंत्री राजधर्म निभा रहे हैं या गठबंधन धर्म. उन्होंने कहा है कि पीएमओ से उन्हें जो उत्तर मिला, वह “छाया प्रति जैसा औपचारिक जवाब” था, जिसमें प्रश्न का कोई स्पष्ट समाधान नहीं दिखता. उन्होंने इस जवाब को “जनता की जिज्ञासा से बच जाना” बताया

गुरुदेव श्री प्रेम ने अपने पत्र में लिखा है कि प्रधानमंत्री को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब गठबंधन की मजबूरियों में ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जो जनता को प्रभावित करते हैं, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी. उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधा सवाल किया है “जनता को तकलीफ होगी तो क्या उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की नहीं मानी जाएगी?

उन्होंने अपने पत्र में ‘राजधर्म’ और ‘गठबंधन धर्म’ का अंतर स्पष्ट करते हुए श्रीराम के उदाहरण का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने राज्य की मर्यादा और जनता के हित को सर्वोपरि रखा और वनवास जैसे कठिन निर्णय भी धर्म के पालन के लिए स्वीकार किए. उनकी दृष्टि में प्रधानमंत्री भी देश के ‘राजा’ के रूप में वही धर्म निभाने के लिए बाध्य हैं।

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गुरुदेव श्री प्रेम ने आरोप लगाया कि गठबंधन की मजबूरी में ऐसे व्यक्तियों को मंत्री बनाया जा रहा है जो किसी भी सदन के सदस्य तक नहीं हैं. उन्होंने कहा कि यह निर्णय “श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे महापुरुषों की परंपरा, राजकीय मर्यादा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री यदि केवल गठबंधन धर्म निभाते हैं तो यह व्यवस्था जनता को कष्ट पहुंचा सकती है, और इस कष्ट की जवाबदेही से प्रधानमंत्री स्वयं को अलग नहीं रख सकते।

गुरुदेव श्री प्रेम ने आगे लिखा कि लाल बहादुर शास्त्री ने रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था. “जब दुनिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को युग पुरुष कहती है, तो उनसे अपेक्षा भी वही है कि वे सर्वोच्च नैतिक मानकों का पालन करें, चाहे सत्ता रहे या जाए।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय को दिए गए अपने मूल प्रश्नों का उन्हें सीधा और स्पष्ट उत्तर नहीं मिला. उनके अनुसार पीएमओ का उत्तर ‘कॉपी’ जैसा था, पर ‘अर्थ’ अस्पष्ट रहा. उन्होंने कहा कि “कॉपी का मतलब नकल होता है, लेकिन पीएमओ का जवाब न नकल था न मौलिक—वह सिर्फ बचने का प्रयास था। गुरुदेव श्री प्रेम ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें कि देश में निर्णय राजधर्म के अनुसार हो रहे हैं या गठबंधन धर्म के अनुसार? उनका कहना है कि “प्रधानमंत्री पूरे देश के नेता हैं, केवल गठबंधन के नहीं. यदि गठबंधन में अपराध प्रवृत्ति वाले लोग हैं और उनकी वजह से जनता को हानि पहुंचती है, तो इतिहास इसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर ही डालेगा। गुरुदेव श्री प्रेम ने कहा कि वे मोदी को ‘युग पुरुष’ की उपाधि देते हैं, इसलिए उनसे सर्वोच्च स्तर की नैतिकता की ही अपेक्षा करते हैं. उन्होंने कहा की आप किस परिस्थिति में कौन-सा निर्णय लेते हैं, यह कम महत्वपूर्ण है; महत्वपूर्ण यह है कि निर्णय जनता को न्याय देने वाले हों।

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