पूर्णिया, (न्यूज़ क्राइम 24) जिले में शिशुओं के शुरुआती छ: महीनों में होने वाले आरंभिक वृद्धि अवरोध (EGF) की पहचान एवं प्रबंधन को सुदृढ़ करने हेतु स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुक्रवार को होटल सेंटर पॉइंट, पूर्णिया में एम्स पटना से डॉ दीपिका एवं डॉ वेंकटेश द्वारा क्षमता वृद्धि कराया गया। इस दौरान सिविल सर्जन डॉ प्रमोद कुमार कन्नौजिया, डीपीएम सुरेंद्र कुमार दास, जिला सामुदायिक उत्प्रेरक (डीसीएम) नवीन कुमार दास, जिला अनुश्रवण एवं मूल्यांकन पदाधिकारी आलोक कुमार, यूनिसेफ राज्य सलाहकार वृंदा किराडू, जिला पोषण सलाहकार निधि भारती, जिला एनीमिया मुक्त भारत सलाहकार शुभम गुप्ता, ईजीएफ प्रखंड समन्वयक, सभी प्रखंड के चिकित्सा पदाधिकारी एवं प्रखंड सामुदायिक उत्प्रेरक, प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक तथा आईसीडीएस से बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, महिला पर्यवेक्षिका एवं प्रखंड समन्वयक उपस्थित रहे।
सिविल सर्जन की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समीक्षा बैठक एवं कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला के अंतर्गत प्रखंड के पदाधिकारियों एवं प्रतिभागियों की क्षमता को विकसित करना था, ताकि समुदाय स्तर पर शिशुओं और माताओं के लिए गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ सुनिश्चित की जा सकें। यह समीक्षा बैठक एवं कार्यशाला यूनिसेफ बिहार एवं एम्स पटना के तकनीकी सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें एम्स पटना एवं यूनिसेफ से आये प्रशिक्षकों ने प्रतिभागियों को शिशु पोषण, वृद्धि निगरानी, स्तनपान परामर्श, जोखिम पहचान तथा समुदाय आधारित प्रबंधन प्रक्रियाओं पर व्यापक मार्गदर्शन प्रदान किया।
पहले छ: माह शिशु की शारीरिक, मानसिक और संज्ञानात्मक वृद्धि का सर्वाधिक संवेदनशील समय है, इसलिए इस अवधि में किसी भी प्रकार की पोषण-संबंधी कमी लंबे समय तक प्रभाव डाल सकती है :
प्रतिभागियों को शिशु संवर्धन संबंधित पुस्तक एवं “6 कदम” जैसे महत्वपूर्ण व्यवहारिक मॉड्यूल्स की जानकारी दी गई। प्रतिभागियों के बीच पायलट प्रखंड कसबा एवं पूर्णिया पूर्व में चल रहे प्रोग्राम की समीक्षा की गई साथ ही प्रोग्राम की महत्ता के बारे में बताया गया कि बिहार में जन्म के शुरुआती महीनों में कम वजन, समय से पहले जन्म, संक्रमण तथा अनुचित स्तनपान जैसी वजहों से बड़ी संख्या में शिशु विकास की दृष्टि से जोखिम में रहते हैं। विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि पहले छ: माह शिशु की शारीरिक, मानसिक और संज्ञानात्मक वृद्धि का सर्वाधिक संवेदनशील समय है, इसलिए इस अवधि में किसी भी प्रकार की पोषण संबंधी कमी लंबे समय तक प्रभाव डाल सकती है।
प्र
तिभागियों को शिशु संवर्धन संबंधित पुस्तक एवं “6 कदम” जैसे महत्वपूर्ण व्यवहारिक मॉड्यूल्स दिया गया एवं इसके माध्यम से यह समझाया गया कि समय पर पहचान, उचित परामर्श, नियमित फॉलो-अप और समुदाय व स्वास्थ्य प्रणाली के बीच मजबूत समन्वय से अधिकांश शिशुओं की स्थिति घर-परिवार में रहते हुए भी सुधारी जा सकती है। डॉ वेंकटेश ने समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में प्रतिभागियों के बीच चर्चा की। इसके साथ ही डॉ दीपिका द्वारा विशेष रूप से यह भी प्रशिक्षित किया गया कि —
•जन्म के बाद 1 सप्ताह से लेकर 6 माह तक की निर्धारित विज़िट में किन संकेतों पर ध्यान देना है।
•स्तनपान की सही पोज़िशनिंग, अटेचमेंट और आवृत्ति का आकलन कैसे करें।
•कब शिशु को गंभीर जोखिम की श्रेणी में रखकर SNCU/NRC रेफर करना आवश्यक है।
•कैसे पोषण ट्रैकर, एम-आशा और भीएचएसएनडी जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए ट्रैकिंग और समन्वय को मजबूत किया जा सकता है।
कार्यक्रम से स्वास्थ्य और आईसीडीएस तंत्र के बीच बढ़ेगा तालमेल तथा कम वजन के साथ जन्मे शिशुओं पर लक्षित सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी :
इस अवसर पर यूनिसेफ प्रतिनिधियों ने कहा कि यह प्रशिक्षण न केवल फ्रंट लाईन वर्कर्स को तकनीकी कौशल प्रदान करता है, बल्कि उन्हें परिवारों के साथ प्रभावी संचार स्थापित करने और व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करने में भी सक्षम बनाता है। कार्यक्रम से स्वास्थ्य और आईसीडीएस तंत्र के बीच तालमेल बढ़ेगा तथा कम वजन के साथ जन्मे शिशुओं पर लक्षित सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी। कार्यशाला में प्रतिभागियों ने विभिन्न केस-स्टडी, समूह अभ्यास के माध्यम से वास्तविक परिस्थितियों में उपयोगी कौशल अर्जित किए। कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों ने इसे अपने कार्य में अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इससे बच्चों की वृद्धि एवं पोषण स्थिति में सुधार लाने में निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। कार्यक्रम में आशा एवं सेविकाओं द्वारा शिशु संवर्धन कार्यक्रम के तहत समय पर बच्चों की पहचान करते हुए उनके ग्रोथ में बदलाव से संबंधित एवं रेफरल की सही जानकारी दी गई एवं उनका क्षमता बढ़ा।
