बिहार

कंगारू मदर केयर से मिली नवजात को नई जिंदगी : कम वजन के साथ जन्मी संतान अब है स्वस्थ

पूर्णिया, (न्यूज़ क्राइम 24) जब मेरे बच्चे का जन्म हुआ, तो उसका वजन मात्र 2 किलो 210 ग्राम था। मैं और मेरा परिवार बहुत चिंतित थे, लेकिन रानीपतरा अस्पताल की नर्सों और आशा दीदी ने हमें घबराने के बजाय ‘कंगारू मदर केयर’ की सलाह दी। अस्पताल के वार्ड से शुरू हुआ यह सफर आज घर पर भी जारी है और मेरा बच्चा अब तेजी से स्वस्थ हो रहा है।” यह कहना है पूर्णिया पूर्व प्रखंड के आंगा टोला की रहने वाली लाभार्थी प्रीति कुमारी का। प्रीति की यह कहानी उन हजारों माताओं के लिए एक मिसाल है, जिनके बच्चे जन्म के समय कम वजन (एलबीडब्ल्यू) के कारण जोखिम में होते हैं। 26 दिसंबर को प्रसव के बाद जब स्वास्थ्य कर्मियों ने बच्चे का वजन लिया, तो वह सामान्य से काफी कम पाया गया। इसके बाद अस्पताल में मौजूद कंगारू मदर केयर (केएमसी) वार्ड में बच्चे को रखा गया। एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं ने प्रीति को सिखाया कि कैसे बच्चे को अपने सीने से सटाकर रखने से शरीर की गर्मी बच्चे के विकास में जादुई असर करती है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी आशा कार्यकर्ता लगातार घर जाकर फॉलोअप ले रही हैं।

परिजनों के स्पर्श और शरीर की गर्मी से बढ़ा बच्चे का वजन :

​लाभार्थी प्रीति कुमारी ने बताया कि अस्पताल में स्वास्थ्य कर्मियों ने उन्हें समझाया कि कंगारू मदर केयर की तरह बच्चे को सीने से सटाकर रखने और शरीर की गर्मी देने से विकास की गति तेज होती है। अस्पताल में प्रसव के बाद जरूरी जांच और दवाइयों के साथ ही उन्हें इस तकनीक का अभ्यास कराया गया। घर आने के बाद स्थानीय आशा दीदी ने भी लगातार निगरानी रखी और बताया कि कैसे परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें मदद कर सकते हैं। प्रीति के अनुसार, घर में भी इस पद्धति को अपनाने से उनके बच्चे के वजन में सुधार हुआ है और वह अब पहले से कहीं अधिक सक्रिय और सुरक्षित महसूस कर रही है।

माँ के अलावा परिवार के अन्य सदस्य भी दे सकते हैं केएमसी :

​अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रानीपतरा की एएनएम पूजा कुमारी ने बताया कि कमजोर बच्चों के लिए यह तकनीक रामबाण है। उनके अनुसार, इसके लिए केवल माँ ही नहीं, बल्कि पिता, दादी, चाची या परिवार का कोई भी वरिष्ठ सदस्य बच्चे को दिन में 4-5 बार कंगारू मदर केयर दे सकता है। इसमें बच्चे के दोनों हाथ ऊपर और पैर नीचे रखते हुए उसे परिजन के सीने से सटाकर रखा जाता है। जब तक बच्चा और देखभाल करने वाला व्यक्ति पसीने-पसीने न हो जाए, तब तक यह प्रक्रिया प्रभावी रहती है। इससे न केवल वजन बढ़ता है, बल्कि बच्चा माँ का दूध भी अच्छी तरह पीता है और उसमें चिड़चिड़ापन कम होता है। जिन बच्चों का वजन 2500 ग्राम से कम होता है, उनके लिए दिन भर में कम से कम 3 से 4 बार केएमसी देना अनिवार्य है।

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सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है विशेष केएमसी कॉर्नर की सुविधा :

​पूर्णिया पूर्व प्रखंड के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शरद कुमार ने जानकारी दी कि क्षेत्र के दो प्रमुख अस्पतालों, रानीपतरा और महेंद्रपुर को राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (एनक्यूएएस) प्रमाणपत्र प्राप्त है। इन दोनों केंद्रों पर कमजोर नवजात शिशुओं के लिए विशेष कंगारू मदर केयर कॉर्नर बनाए गए हैं। यहाँ प्रसव के तुरंत बाद कमजोर शिशुओं की पहचान की जाती है और उन्हें केएमसी वार्ड में रखकर माताओं को प्रशिक्षित किया जाता है। डॉक्टर शरद कुमार ने जोर देकर कहा कि अस्पताल में दी गई यह जानकारी जब परिजन घर पर भी अपनाते हैं, तो शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आती है और बच्चे का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है।

स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा घर-घर जाकर किया जा रहा फॉलोअप :

​पूर्णिया पूर्व के बीएचएम विभव कुमार ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य केवल अस्पताल के भीतर उपचार देना नहीं है, बल्कि बच्चे के पूर्ण स्वस्थ होने तक उसकी निगरानी करना है। इसके लिए सभी एएनएम और आशा कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी स्वास्थ्य कर्मी संबंधित घर का दौरा करते हैं और देखते हैं कि बच्चे को केएमसी सुविधा मिल रही है या नहीं। विभव कुमार के अनुसार, इस निरंतर फॉलोअप का सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब लोग इस वैज्ञानिक पद्धति के प्रति जागरूक हो रहे हैं, जिससे नवजात शिशुओं को एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन मिल रहा है।

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