सोनू मिश्रा, क्राइम ब्यूरो| बिहार दिवस का मतलब सिर्फ अपने गौरवशाली अतीत को याद करना नहीं है, बल्कि यह सोचने का भी समय है कि हम आज कहाँ खड़े हैं और हमें आगे कहाँ जाना है। बिहार कभी ज्ञान और समृद्धि का केंद्र था। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में दुनिया भर से छात्र शिक्षा लेने आते थे। सम्राट अशोक ने पूरी दुनिया को शांति और नीति का संदेश दिया। चाणक्य की रणनीति ने राजनीति को एक नई दिशा दी। महावीर और बुद्ध की इस धरती ने पूरी दुनिया को अहिंसा और ज्ञान का मार्ग दिखाया।
लेकिन आज का बिहार उस स्वर्णिम इतिहास से बहुत पीछे छूट चुका है। यहाँ की राजनीति सिर्फ वोट बैंक और जातिवाद तक सीमित रह गई है। चुनावी घोषणाओं में बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में विकास कहीं नजर नहीं आता। यहाँ इंडस्ट्री, आईटी सेक्टर और फैक्ट्रियों का घोर अभाव है, जिससे युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार नहीं मिल पाता।
मजबूरी में उन्हें दूसरे राज्यों में काम करने जाना पड़ता है, जहाँ उन्हें कई तरह की बातें सुननी पड़ती हैं। “बिहारी” शब्द कई जगह गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और बाहरी समझकर कमतर आंका जाता है। लेकिन यह भी सच है कि बिहार के लोग जहाँ भी जाते हैं, अपनी मेहनत और काबिलियत से नाम कमाते हैं।
आज हमें यह सोचना होगा कि क्या हम सिर्फ अतीत पर गर्व करके खुश रह सकते हैं, या हमें अपने वर्तमान को सुधारने और भविष्य को संवारने की ज़रूरत है। बिहार दिवस सिर्फ उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प लेने का अवसर भी होना चाहिए।
हमें जातिवाद, भ्रष्टाचार और संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर बिहार को विकास की राह पर लाना होगा। अगर हम अपने अतीत से भी बेहतर बिहार बनाना चाहते हैं, तो यह ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझें, सरकारों से सवाल पूछें और अपने स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश करें। बिहार को फिर से शिक्षा, उद्योग और रोजगार का केंद्र बनाना होगा, ताकि किसी बिहारी को अपने ही परिवार से दूर जाकर पेट पालने की मजबूरी न हो।
आइए, इस दिन सिर्फ अतीत पर गर्व करने के बजाय एक नए, सशक्त और विकसित बिहार के निर्माण का संकल्प लें।
