बिहार

रोगग्रस्त नवजात का जीवन सुरक्षित रखने में एसएनसीयू की भूमिका महत्वपूर्ण

अररिया(रंजीत ठाकुर): सही पोषण का अभाव, कम उम्र में शादी, एएनसी जांच में अनदेखी सहित कई अन्य वजहों से बच्चे बीमार ही जन्म लेते हैं। छोटे नवजात में किसी तरह के रोग का पता लगाना बेहद जटिल होता है। इसलिये जन्म के उपरांत बच्चे के वजन, आकार, आव-भाव, हरकतों व लक्षणों के आधार पर रोगग्रस्त बच्चों की पहचान की जाती है। प्रसव वार्ड में तैनात चिकित्सक ही नहीं बहुत सारी एएनएम व जीएनएम भी बाल रोग की पहचान में बेहद दक्ष होते हैं। उन्हें नियमित इसे लेकर प्रशिक्षित भी किया जाता है। रोगग्रस्त बच्चे की पहचान सुनिश्चित होते ही इसे अस्पताल परिसर में बने स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में भेजा जाता है। जो नवजात रोगों के उपचार के लिये खासतौर पर बनाया गया है। सभी जरूरी संसाधन से इसे सुसज्जित किया गया है। बावजूद आम लोगों में इसके प्रति जागरूकता का अभाव है। लिहाजा बीमार नवजात के इलाज के चक्कर में वे बड़ी आसानी से किसी निजी क्लिनिक में जा कर इलाज में हजारों खर्च करते हैं।

कैसे होती है बाल रोग की पहचान :

जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ मो मोईज बताते हैं कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे का नहीं रोना, शरीर व हाथ-पांव का रंग पीला होना, हाथ-पांव का ठंडा होना। मां का दूध नहीं पीना, बहुत ज्यादा रोना या बहुत ज्यादा सुस्त होना, चमकी, नवजात का वजन तय मानक से कम या अधिक होना, समय से पूर्व बच्चे का जन्म, कटे तालु व होंठ सहित कई अन्य लक्षणों के आधार पर रोगग्रस्त नवजात की पहचान की जाती है।

जरूरी आधुनिक सुविधाओं से लैस है एसएनसीयू :

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अस्पताल प्रबंधक विकास आनंद ने बताया कि नवजात रोगग्रस्त होने पर उसे एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है। जहां कम से कम 24 से 48 घंटों तक प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी व चिकित्सक की देखरेख में बच्चों का रहना जरूरी है। इस दौरान बच्चों की हालत पर पूरी निगरानी रखी जाती है। उन्होंने बताया कि एसएनसीयू में रेडियो वॉर्मर, ऑक्सीजन की सुविधा, फोटो थैरेपी जो जोंडिस पीड़ित बच्चों के लिये महत्वपूर्ण है। नवजात के लिये डाइपर, सेक्शन मशीन सहित अन्य सुविधाएं मौजूद हैं। एसएनसीयू में अपने बच्चे का इलाज करा रही परमिला बेगम ने बताया उनका पोता जन्म लेने के बाद रोया तक नहीं। शरीर में कोई हलचल भी नहीं थी। हम तो हताश हो चुके थे। बच्चे को एसएनसीयू ले जाया गया। जहां महज एक घंटे के बाद बच्चा रो भी रहा था और मां का दूध पीने की कोशिश भी करने लगा था।

नवजात का 24 से 48 घंटे तक विशेष निगरानी में रहना जरूरी:

सिविल सर्जन अररिया विधानचंद्र सिंह ने बताया कि एसएनसीयू बीमार नवजात को जीवनदान देने में सक्षम है। बहुत से लोग इसका लाभ भी उठा रहे हैं। लेकिन कुछ लोग हैं जो नवजात की बीमारी से परेशान होकर इधर-उधर भटक कर अपना व अपने नवजात को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि एसएनसीयू में सारी सेवाएं नि:शुल्क हैं। इलाजरत नवजात के माता पिता को थोड़ा धैर्य रखने की जरूरत है। अक्सर अभिभावक नवजात की तबीयत में थोड़ा सुधार होने पर उसे घर ले जाने की जिद करते हैं। उन्हें समझना चाहिये कि बीमार नवजात का एसएनसीयू में 24 से 48 घंटे तक विशेष चिकित्सकीय देखरेख में रहना जरूरी है।

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