बिहार

चकबैरिया में प्राण प्रतिष्ठा से गूंजा आस्था का स्वर, श्री राम कथा ने दिया धर्म और कर्तव्य का संदेश

फुलवारीशरीफ, अजित। नगर परिषद क्षेत्र के चकबैरिया गांव में आयोजित सात दिवसीय श्री सूर्य नारायण मंदिर प्राण प्रतिष्ठा सह श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ आध्यात्मिक वातावरण में अपने छठे दिन प्रवेश कर गया. महायज्ञ के इस महत्वपूर्ण दिन नवनिर्मित श्री सूर्य नारायण मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा संपन्न कराई गई, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हो उठा। प्रातः काल से ही मंदिर परिसर और यज्ञशाला में धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हो गया था. विद्वान आचार्यों के निर्देशन में हवन, पूजन और वैदिक कर्मकांड संपन्न हुए. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पूरे दिन पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए उमड़ती रही. धार्मिक कार्यक्रम के दौरान वातावरण मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन से गुंजायमान रहा.

महायज्ञ के अवसर पर स्वामी जीयर स्वामी ने अपने प्रवचन में श्री राम कथा के माध्यम से जीवन मूल्यों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जीवन त्याग, सत्य, धर्म और कर्तव्य पालन का सर्वोत्तम उदाहरण है. श्री राम कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं बल्कि समाज और मानव जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणादायक गाथा है. उन्होंने कहा कि श्री राम का चरित्र समाज में न्याय, समरसता और आदर्श जीवन की भावना को मजबूत करता है।

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स्वामी जीयर स्वामी ने प्रवचन के दौरान क्षत्रिय शब्द के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि क्षत्रिय होना केवल युद्ध या शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक नहीं है, बल्कि धर्म की रक्षा, समाज की सुरक्षा और अन्याय के खिलाफ दृढ़ता से खड़े होना ही सच्चा क्षत्रिय धर्म है. उन्होंने कहा कि साहस के साथ संयम, करुणा और जिम्मेदारी का पालन करना ही सच्चे क्षत्रिय का परिचायक होता है। उन्होंने चित्रकूट धाम का वर्णन करते हुए बताया कि यह वह पवित्र स्थल है जहां भगवान श्री राम ने वनवास काल का महत्वपूर्ण समय व्यतीत किया था. चित्रकूट को तप, त्याग और साधना की भूमि बताते हुए उन्होंने अगस्त्य ऋषि की तपस्या और उनके सांस्कृतिक योगदान का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि ऋषियों की साधना और तप के कारण ही सनातन संस्कृति आज भी जीवंत और प्रासंगिक बनी हुई है.ऋषियों की तपस्या और साधना से ही सनातन संस्कृति आज भी जीवंत और युगानुकूल बनी हुई है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने कठोर तप, ध्यान और साधना के माध्यम से केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और अनुशासित बनाने की परंपरा स्थापित की. उन्होंने वेद, उपनिषद, पुराण और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के जरिए मानव जीवन के उद्देश्य, कर्तव्य और नैतिकता का मार्ग प्रशस्त किया. ऋषियों ने प्रकृति, समाज और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाने की शिक्षा दी, जिससे समाज में सद्भाव और मर्यादा कायम रही।

ऋषियों की शिक्षाओं ने भारतीय संस्कृति को ज्ञान, विज्ञान, आयुर्वेद, योग और आध्यात्मिक साधना से समृद्ध किया. उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ज्ञान का प्रसार किया, जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण होता रहा. उनके द्वारा स्थापित यज्ञ, अनुष्ठान और धार्मिक परंपराएं समाज को एकजुट करने और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने का माध्यम बनीं। ऋषियों ने सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा और धर्म पालन जैसे मूल्यों को जीवन का आधार बताया. यही कारण है कि समय के साथ बदलती परिस्थितियों और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद सनातन संस्कृति अपनी पहचान बनाए हुए है और समाज को नैतिकता, कर्तव्य और आध्यात्मिक संतुलन का संदेश देती आ रही है। महायज्ञ को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है. बिहार के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु चकबैरिया पहुंच रहे हैं. प्राण प्रतिष्ठा के साथ यह आयोजन अपने चरम पर पहुंच गया है और धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पूरे क्षेत्र में नई ऊर्जा और पहचान स्थापित कर रहा है।

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