एक कहानी बहुत पुरानी कथा है। रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है, इसे प्रायः लोग जानते हैं। आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे बहुत पुरानी कथा है। शास्त्रों के अनुसार रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होती है। इस महीने रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि यानि 1 जुलाई 2022 को मनाया जा रहा है । रथ यात्रा मनाए जाने के पीछे सदियों पुराना इतिहास है।
कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे। उन्हें समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ (लकड़ी) दिखा। राजा उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनाना चाहते थे। रजा के मन में जैसे ही यह विचार आया की इस सुंदर लकड़ी से जगदीश की मूर्ति बनाई जाए, वैसे ही बूढ़े बढ़ई के रूप में स्वयं विश्वकर्मा जी प्रस्तुत हो गए।
उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूरी तरह बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए।
राजा के परिवार जनों को यह मालूम न था कि ,वह बूढ़ा बढ़ई कौन है ?? कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिए वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा।
अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला । लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।
महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’
आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथ यात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथ यात्रा माता सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण और बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है।
