बिहार

14 साल से विदेश में फंसे पटना के प्रोफेसर की पुकार: वेतन बकाया, डिक्री लागू नहीं, खुद को ‘जिंदा’ साबित करने की लड़ाई

फुलवारीशरीफ, अजीत। पटना के रहने वाले प्रोफेसर संजीवधारी सिंहा बीते 14 वर्षों से विदेश में फंसे होने, वेतन बकाया रहने और सरकारी आदेशों के पालन नहीं होने को लेकर न्याय की गुहार लगा रहे हैं. उनका आरोप है कि संबंधित संस्थानों और विभागों की लापरवाही के कारण उन्हें लगातार मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

प्रोफेसर सिंहा के अनुसार, वर्ष 2013 से वे विदेश में कार्यरत हैं और इस दौरान कई सरकारी डिक्री (2014-17 और 2018-21) के तहत उनकी सेवा को मान्यता दी गई, लेकिन इन आदेशों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया. उन्होंने बताया कि कुल 39 महीनों का वेतन बकाया है, जबकि केवल 21 महीनों का ही भुगतान किया गया है.

उन्होंने दावा किया कि उनके पास डोमिसाइल, बैंक स्टेटमेंट, पासपोर्ट (जिसमें बाहर जाने की एंट्री नहीं), एनओसी, 2018, 2019 और 2020 की कमेटी रिपोर्ट, समन, संयुक्त राष्ट्र से जुड़े दस्तावेज, भारतीय दूतावास और मंत्रालयों के पत्र जैसे कई ठोस साक्ष्य मौजूद हैं, जो उनके कार्य और उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं. इसके बावजूद उन्हें कई बार “लापता” या “अवैध” तक करार देने की कोशिश की गई।

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प्रोफेसर सिंहा ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं काटने की धमकी दी गई, पुलिस शिकायतों का सामना करना पड़ा और प्रशासनिक स्तर पर उनकी फाइलों को लगातार टालमटोल किया गया. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उनके मौलिक और श्रम अधिकारों का उल्लंघन है। इन सब परिस्थितियों के बावजूद प्रोफेसर सिंहा ने अपना शैक्षणिक और सामाजिक कार्य जारी रखा. वे लगातार पढ़ाते रहे, कोचिंग चलाते रहे, लेखन और शोध कार्य करते रहे, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेते रहे, मीडिया में अपनी बात रखते रहे और खेल गतिविधियों में भी सक्रिय रहे।

प्रोफेसर सिंहा ने भारत सरकार, बिहार सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय, अटॉर्नी जनरल, न्याय मंत्रालय और भारतीय दूतावास से अपील की है कि उनके मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच कराई जाए और बकाया वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए. उन्होंने कहा कि उन्हें “गुमशुदा फाइल” नहीं, बल्कि एक जीवित नागरिक के रूप में देखा जाए, जो वर्षों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि समय रहते इस मामले पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन होगा, बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी सवाल खड़े करेगा. फिलहाल उनकी निगाहें सरकार और संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे उन्हें न्याय की उम्मीद है।

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