फुलवारीशरीफ(अजीत यादव): स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर पटना के फुलवारी शरीफ में ऐतिहासिक कवि सम्मेलन और मुशायरा में नामचीन हस्तियों ने अपने अनोखे अंदाज शेरो शायरी का ऐसा साज छेड़ा की महफिल में बैठे लोग वाह वाह कर उठे.अदब और तहजीब की ऐतिहासिक सरजमी अजीमाबाद ( पटना) की रविवार की शाम बेहतरीन चुनिंदा कवियों के कविताएं और शेरो शायरी का गवाह बन गया . अंदाज ए बयां और इवेंट्स दुबई और पटना लिटेरी फेस्टिवल के इस आयोजन में देश के कई बड़े कवि और शायरो ने शाम रंगीन बना डाला.
इस मुशायरा एवं कवि सम्मेलन में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कवियों में आलम खुर्शीद, नौमान शॉक, शबीना अदीब, शकील आजमी, कुँवर जावेद, अजहर इकबाल (निजामत), सपना मोलचंदानी, हिना रिज़वी हैदर, जहाज देवबंदी, मेहशर अफरीदी, शारिक कैफी, सदफ इक़बाल, सर्वेश अस्थाना, सोनू रूपा विशाल ने अपनी गज़लों, गीतों नज़्मों और मजाहिया कलाम से श्रोताओं और प्रशंसकों को खूब लुभाया और झुमाया. जबकि मुशायरा एवं कवि सम्मेलन की संचालन शगुफ्ता यास्मीन ने बहुत उत्कृष्ट अंदाज में किया.
पीएलएफ के अध्यक्ष डॉ. ए.ए. हई ने सभी अतिथियों और उपस्थित लोगों का स्वागत किया और कहा कि उर्दू की मीठी भाषा और मुशायरा और कवि सम्मेलन से ही डर के माहौल को दूर किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि आज के जो हालात है वैसे परिस्थितियों में ऐसे आयोजन लोगों के दिलों को जोड़ने और अमन का पैगाम हर मजहब के बीच फैलाने का काम करेगा. बिहार विधान परिषद के चेयरमैन देवेश चंद्र ठाकुर ने खुर्शीद अहमद को बधाई दी और कहा कि उर्दू भाषा ऐसी है कि आप समझ सकें या न समझ सकें, लेकिन उर्दू भाषा मीठी है और अच्छी लगती है.मुशायरा एवं कवि सम्मेलन के दौरान जीएसटी कमिश्नर असलम हसन की पुस्तक संग्रह कलाम दरीचे की धूप का विमोचन किया गया.
सदफ् इकबाल ने जब
दरिया पर्वत समतल सहरा कोई नहीं
मंज़िल से वाबिस्ता रास्ता कोई नहीं
अँधे भी तो अक्सर देखा करते हैं
ख्वाबों से आँखों का रिश्ता कोई नही…
अजहर इकबाल ने
ज़मीन-ए-दिल इक अर्से बा’द जल-थल हो रही है
कोई बारिश मेरे अंदर मुसलसल हो रही है
लहू का रंग फैला है हमारे कैनवस पर
तेरी तस्वीर अब जा कर मुकम्मल हो रही है…..
हिना रिजवी हैदर ने सुनाया
हार उसकी, जीतने का शौक़ मेरा ले गयी
फिर मुझे हारा हुआ हर मरहला अच्छा लगा….
नुमान शौक ने सुनाया
किसी ने परचम किसी ने हुल्या किसी ने लहजा बदल लिया है
है दहशत ऐसी आशिक़ों तक ने अपना किबला बदल लिया है
नई नई करबला में हूँ और पानी पानी पुकारता हूँ
मुझे किसी ने नही बताया नदी ने रस्ता बदल लिया है
मेहशर अफरीदी ने जोशीले अंदाज में सुनाया की
मियां वह दिन गए अब ये हिमाक़त कौन करता है
वह किया कहते हैं उसको हाँ मोहब्बत कौन करता है
कोई गम से परेशॉं है कोई जन्नत का तालिब है
घरज़ सजदे कराती है इबादत कौन करता है….
सुनाया तो लोग वाह वाह कर उठे।
