शेखपुरा, उमेश कुमार : जिला के बहुचर्चित नाबालिग दुष्कर्म प्रकरण में अपर सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो अधिनियम), शेखपुरा की अदालत ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सदर प्रखंड के सारिका गांव निवासी ब्रजेश राउत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह निर्णय पॉक्सो वाद संख्या 56/2024 में दिया गया।
न्यायालय ने दोषी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(3) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4(2) के अंतर्गत दोषी पाते हुए प्रत्येक धारा में आजीवन कारावास एवं 30-30 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड अदा नहीं करने की स्थिति में छह-छह माह का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा। न्यायालय ने आदेश दिया कि दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
यह घटना 5 सितंबर 2024 की बताई जाती है। अभियोजन के अनुसार, नाबालिग दलित बालिका जब मवेशियों को चारा देने घर से बाहर निकली थी, उसी दौरान आरोपी ने हथियार के बल पर उसका अपहरण कर सुनसान स्थान पर दुष्कर्म किया था। घटना के बाद पीड़िता किसी प्रकार घर पहुंची और परिजनों को पूरी जानकारी दी। तत्पश्चात उसके पिता द्वारा संबंधित थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया तथा वैज्ञानिक एवं मौखिक साक्ष्य संकलित कर न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत गवाहों एवं साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने अपराध सिद्ध पाया। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि नाबालिगों के विरुद्ध जघन्य अपराधों में कठोर दंड ही न्यायोचित है तथा ऐसे मामलों में किसी प्रकार की नरमी उचित नहीं है।
न्यायालय ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 36(8) तथा पॉक्सो नियम, 2020 के नियम 9 के अंतर्गत पीड़िता को दो लाख रुपये प्रतिकर प्रदान करने का आदेश दिया है। यह राशि बिहार राज्य सरकार द्वारा दी जाएगी। साथ ही, वसूल किए गए अर्थदंड की राशि भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357(1) के अनुसार पीड़िता को प्रदान की जाएगी।
इस संबंध में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, शेखपुरा तथा बाल कल्याण समिति, शेखपुरा को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है। निर्णय की प्रति जिला पदाधिकारी, शेखपुरा को भी प्रेषित करने का आदेश दिया गया है।इस निर्णय को समाज के लिए एक सशक्त संदेश माना जा रहा है कि नाबालिगों के विरुद्ध अपराध करने वालों को कानून के दायरे से बच पाना संभव नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में कठोर दंड ही न्याय और सामाजिक संतुलन की रक्षा का माध्यम है। यह निर्णय न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि समाज में विधि-व्यवस्था के प्रति विश्वास को और अधिक सुदृढ़ करता है।
