बिहार

अतिरिक्त प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र नवाबगंज में गंदगी का अंबार

अररिया(रंजीत ठाकुर): नवाबगंज पंचायत स्थित 1956 में बने अतिरिक्त प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र अपने बदहाली पर आंसू बहा रही है। सरकार के द्वारा स्वास्थ्य विभाग पर लाखों करोड़ों खर्च किए जाते हैं? फिर भी इस अस्पताल का अब तक दिशा और दशा नहीं बदल पाया है। बताते चलें कि अस्पताल सहित परिसर में गंदगी का अंबार लगा रहता है। जबकि साफ-सफाई को लेकर सरकार के द्वारा एनजीओ को यह जिम्मेवारी सौंपी गई है। समाचार संकलन के दौरान आज शनिवार को जब संवाददाता ने अस्पताल परिसर में पहुंचा तो देखा कि चारो तरफ गंदगी का अंबार लगा हुआ है। इस संबंध में उपस्थित कर्मी से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि साफ सफाई का जिम्मेवारी एनजीओ के नरपतगंज प्रखंड सुपरवाइजर मिथिलेश कुमार को दिया गया है, उन्हीं के निर्देश पर साफ सफाई कार्य किया जाता है। जब सुपरवाइजर से मोबाइल के द्वारा बात किया गया तो उन्होंने बताया कि वीरेंद्र मरीक अस्पताल के सफाई कर्मी है। जब सुपरवाइजर से यह पूछा गया कि सफाई कर्मी को कितना रुपैया महीना मानदेय की राशि दिया जाता है, इस पर सुपरवाइजर ने भड़क गया। उन्होंने बताया की हम ठेकेदार हैं?हम काम करवाते हैं, हम नहीं बता सकते हैं कि सफाई कर्मी को कितना रुपैया देते हैं, इसके लिए आप एनजीओ के संचालक अभिनव जी से बात कीजिए।

Advertisements
Ad 1

अभिनव जी से मोबाइल से संपर्क करने के बाद उन्होंने बताया कि मानदेय की राशि कितना दिया जाता है, यह मिथिलेश जी ही बताएंगे, फिर उन्होंने बताया कि स्क्वायर फीट के हिसाब से सफाई कर्मी को मानदेय दिया जाता है। जब उनसे यह पूछा गया कि इस अस्पताल में सफाई कर्मी लगभग बर्ष 2004 से कार्यरत है और यह अस्पताल का लगभग एक एकड़ भूमि का परिसर है,आपको यह पता नहीं है कि सफाई कर्मी को कितना रुपैया दिया जाता है, इस पर उन्होंने कुछ बताने से इनकार किया। संचालक से बात करने के उपरांत कुछ ही देर बाद सफाई कर्मी अस्पताल परिसर पहुंच गया। जब सफाई के संबंध में सफाई कर्मी वीरेंद्र मरीक से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि कुछ दिनों से मेरा तबीयत खराब हो गया था, जिस कारण परेशानी हुई है, उन्होंने यह भी बताया कि हम लोग मजदूर क्लास के लोग हैं हमको पूर्व के संचालक के द्वारा लगभग 12 महीने का मानदेय नहीं दिया गया है, जबकि वर्तमान संचालक के द्वारा 8 महीनों का मानदेय नहीं दिया गया है। यहां तक की अस्पताल का परिसर लगभग एक एकड़ का है, और मुझे केवल1500 रुपैया ही प्रति माह सुपरवाइजर के द्वारा दिया गया है, इतने कम राशि से अपने और अपने परिवार का भरण पोषण करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो विभागीय पदाधिकारी एवं एनजीओ संचालक के लापरवाही के कारण स्वास्थ्य विभाग,अस्वस्थ नजर आते हैं। जबकि सरकार के द्वारा लाखों खर्च किए जा रहे हैं।

Related posts

मैट्रिक परीक्षा को लेकर प्रशासन सख्त : जूता-मोजा पहनकर आने पर पाबंदी, आधे घंटे पहले पहुंचना अनिवार्य

मुख्यमंत्री ने गंगाजी राजगृह जलाशय का किया निरीक्षण

जीविका के रोजगार मेले में 326 युवाओं को जॉब ऑफर, 802 का हुआ पंजीकरण

error: