अररिया, रंजीत ठाकुर। शनिवार को श्रीमद् भागवत कथा सार्वजनिक दुर्गा मंदिर फुलकाहा के परिसर में आकर्षक मनमोहन कथा के साथ भव्य झांकी निकाली गई । यह कार्यक्रम समिति के तत्वाधान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन राजयोगिनी बी.के प्रभा दीदी ने कृष्णा रुक्मणि विवाह, परीक्षित मोक्ष की कथा और राधा कृष्ण की सुंदर झांकी का आयोजन किया। इस दौरान भक्ति भाव में सराबोर होकर भक्त जमकर थिरके।
दीदी ने कहा कि द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि : हे पार्थ , तराजू पर पैर संभलकर रखना, संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना। तो अर्जुन ने कहा : “हे प्रभु” सबकुछ अगर मुझे ही करना है , तो फिर आप क्या करोगे ?? वासुदेव हंसते हुए बोले : हे पार्थ , जो आप से नहीं होगा वह मैं करुंगा।
पार्थ ने कहा : प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता ??
वासुदेव फिर हंसे और बोले : जिस अस्थिर , विचलित , हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे , उस विचलित “पानी” को स्थिर “मैं” रखुंगा !! कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हो , कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हो , कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो , लेकिन आप स्वंय हरेक परिस्थिति के उपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते …. आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हैं , लेकिन उसकी भी एक सीमा है। और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है उसी का नाम “भगवान” है ….
उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि पहले महिलाएं पतिव्रता होती थीं। परंतु वर्तमान में महिलाओं में यह गुण मुश्किल से मिलता है। उन्होंने कहा कि स्त्रियां तीन प्रकार की होती हैं। उत्तम, मध्य व निकृष्ट। कथा वाचिका द्वारा वृंदावन के रासलीला में भोलेनाथ द्वारा जिद करने, वहां श्रीकृष्ण द्वारा मनमोहक बांसुरी बजाने, भोलेनाथ के सुधबुध खो देने जैसे प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को बेहतर जीवन जीने के लिये ज्ञान मार्ग पर चलना चाहिए। किसी दूसरे को कष्ट देकर, गलत रास्ते पर चल कर कोई भी व्यक्ति क्षणिक सुख प्राप्त कर सकता है। परंतु, मानसिक सुख व उन्नति सत्कर्म से प्राप्त होंगे।
