बिहार

बायोफ्यूल स्टेशन लगाने वाले युवा को अधिकारियों की मनमानी से झेलनी पड़ रही है परेशानियाँ

फुलवारी शरीफ, (अजित ) बायोफ्यूल जैसे पर्यावरण हितैषी विकल्प को प्रोत्साहित करने की बात तो सरकार करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे उलट है. बेरोज़गार युवक राहुल झा को इसका जीता-जागता उदाहरण माना जा सकता है, जो मुजफ्फरपुर के बेरुआ गायघाट में राधा फ्यूल स्टेशन स्थापित करने के लिए लंबे समय से प्रयासरत हैं लेकिन, स्वीकृति के लिए लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें केवल हताशा ही मिली है. राहुल का आरोप है कि संबंधित अधिकारी एनओसी देने में न केवल टालमटोल कर रहे हैं, बल्कि परोक्ष रूप से पैसों की मांग भी कर चुके हैं.

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू यह है कि एक ही ज़मीन के संबंध में दो अलग-अलग वन पदाधिकारियों (डी एफ ओ) द्वारा विरोधाभासी रिपोर्ट दी गई हैं.एक डी एफ ओ क़ी रिपोर्ट में बताया गया कि उस स्थान पर कोई पेड़ या पर्यावरणीय बाधा नहीं है.जबकि दूसरा डी एफ ओ महज 15 दिन बाद अपनी रिपोर्ट में वहाँ पेड़ों की मौजूदगी दर्शाते हुए, उनके काटने की बात कही गई. क्या पूरा मामला भ्रष्टाचार को उजागर करता है एक डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट दी कि वहां पेड़ है ही नहीं दूसरी रिपोर्ट मे दूसरा डीएफओ का कहना है कि पेड़ था जिसे काट दिया गया. बड़ा सवाल यह उठता है –अगर वहाँ कुछ था ही नहीं, तो काटा क्या गया?”और अगर कुछ था, तो पहली रिपोर्ट गलत क्यों दी गई?”इन विरोधाभासों ने सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इससे न केवल भ्रष्टाचार की बू आती है, बल्कि प्रशासनिक पक्षपात की भी आशंका गहराती है.

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इस गंभीर विषय को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए प्रख्यात शिक्षाविद्, पर्यावरणविद् और भारतीय लोकगीत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरुदेव श्री प्रेम ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को पत्र लिखकर उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है. उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यदि इस तरह की दोहरी नीति को नहीं रोका गया, तो यह न सिर्फ युवाओं के सपनों को कुचलेगा, बल्कि पर्यावरणीय योजनाओं की भी अवमानना होगी. देखना यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या राहुल झा को न्याय मिल पाता है या नहीं.

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