फुलवारीशरीफ, अजीत। गौरीचक थाना क्षेत्र के अंडारी गांव के निवासी शिक्षक देवानंद रजक अपने जीवन में अनेकों कठिनाइयों के बावजूद बच्चों की शिक्षा और परिवार की देखभाल के लिए संघर्ष कर रहे हैं.बचपन में दाहिना हाथ गंवाने के बावजूद इंटर पास कर बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक देवानंद रजक अब बाएं हाथ में पक्षाघात के कारण न पढ़ा पा रहे हैं न कोई काम करने लायक हैं. गौरीचक में लॉजिस्टिक पार्क के लिए अधिग्रहित उनकी जमीन का मुआवजा उनके पिता ने हड़प लिया और अब तक कोई मदद नहीं कर रहे हैं. वे समाज और प्रशासन से हस्तक्षेप कर सहायता की गुहार लगा रहे हैं और न्याय की उम्मीद कर रहे हैं.फिलहाल दिव्यांग पेंशन और आसपास के लोगों से मदद मिलती है .थोड़ा बहुत दूसरे के घरों में पत्नी काम करके दो वक्त की रोटी का बमुश्किल जुगाड हो रहा है।
देवानंद का जीवन साहस और संघर्ष की मिसाल है. वर्ष 1993 में मैट्रिक से पहले, गांव में गेहूं फसाने वाली मशीन में दुर्घटना के कारण उनका दाहिना हाथ कट गया. उन्होंने बताया कि एक अन्य लड़के का हाथ मशीन में फंसा हुआ था और उसे बचाने के प्रयास में उनका हाथ भी कट गया, जबकि वह लड़का मौत के घाट उतर गया। इस भीषण दुर्घटना के बावजूद, देवानंद ने हार नहीं मानी. उन्होंने बाएं हाथ से मेहनत करके मैट्रिक की परीक्षा पास की और इंटर की पढ़ाई पूरी की, लेकिन लगातार बीमारी और दिव्यांगता के कारण ग्रेजुएशन पूरी नहीं कर पाए.
हाथ कट जाने और बीमारी के बावजूद, उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया. उन्होंने अपने गांव और आस-पास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. वर्षों तक उन्होंने कोचिंग दी, बच्चों को पढ़ाया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि उनका स्वास्थ्य अत्यधिक कमजोर है और बाएं हाथ में अब पक्षाघात के कारण काम करना मुश्किल हो गया है. बार-बार बीमारी और दिव्यांगता के कारण पढ़ाई और कोचिंग करना भी कठिन हो गया है, फिर भी वे बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने देते।
देवानंद ने बताया कि उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य उनके प्रति उचित व्यवहार नहीं करते. माता शारदा देवी के साथ भी मारपीट होती है और पिता राजकुमार रजक ने बंगाल के आसनसोल में उनके परिवार की संपत्ति बेच दी और उससे मिलने वाली राशि अपने पास रख ली। वर्तमान में देवानंद अपनी पत्नी सिमतादेवी और दो छोटे बच्चों—अंशुल राजू और विशाखा रानी—के साथ पटना के भूतनाथ इलाके में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं. दिव्यांग पेंशन और सीमित साधनों से जीवन चलाना मुश्किल हो गया है।
गांव में उनके दादा की पैतृक संपत्ति और परिवार की जमीन सरकार द्वारा लॉजिस्टिक पार्क बनाने के लिए अधिग्रहित की गई. इस अधिग्रहण में उनके परिवार की लगभग दस कट्ठा जमीन चली गई, लेकिन उसका मुआवजा उनके पिता ने अपने पास रख लिया। देवानंद रजक का कहना है कि उनकी हालत, बीमारी और दिव्यांगता के बावजूद, वे बच्चों की शिक्षा के लिए किसी भी कठिनाई को सहते हैं. उन्होंने बताया कि अब उनकी सेहत इतनी कमजोर हो गई है कि कभी-कभी खुद पढ़ाई और कोचिंग करना भी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने समाज और प्रशासन से न्याय और आर्थिक सहायता की गुहार लगाई है. उनका कहना है कि अब उन्हें कहीं से मदद नहीं मिल रही है और इसलिए वे गौरीचक थाना पुलिस से न्याय की गुहार लगाने की तैयारी कर रहे हैं।
