फुलवारीशरीफ, अजित। एम्स पटना के बाल चिकित्सा विभाग द्वारा 28 फरवरी एवं 1 मार्च 2026 को “पीडियाट्रिक डायलिसिस एंड थेराप्यूटिक अफेरेसिस मॉड्यूल फॉर इमरजेंसी” विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला में बाल चिकित्सा डायलिसिस के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत प्रशिक्षण दिया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के कार्यकारी निदेशक डॉ. (प्रो.) राजू अग्रवाल ने किया. उन्होंने कहा कि बिहार के विभिन्न जिलों और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में गुर्दा रोग से पीड़ित बच्चों को एम्स पटना रेफर किया जाता है. ऐसे में इस प्रकार के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम बाल गुर्दा रोग सेवाओं को सशक्त बनाने और गंभीर रूप से बीमार बच्चों के बेहतर उपचार के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार के अलग-अलग हिस्सों से लगभग 60 शिशु रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया. कार्यशाला में बाल चिकित्सा डायलिसिस तकनीक, गुर्दा रोगों के निदान और प्रबंधन में अल्ट्रासाउंड की भूमिका तथा तीव्र गुर्दा रोग से ग्रसित बच्चों के आपातकालीन प्रबंधन प्रोटोकॉल पर विस्तृत जानकारी दी गई.
कार्यक्रम की मुख्य आयोजक और आधारशिला रीनल केयर प्रोजेक्ट की संस्थापक श्रीमती नीना जॉली ने बताया कि इस पहल के तहत अब तक देशभर में 200 से अधिक डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और कई संस्थानों को डायलिसिस मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं. उन्होंने वंचित क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण बाल गुर्दा रोग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
पीडी-टेम कोर्स निदेशक प्रो. अभिजीत साहा, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली में कार्यरत, तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ओ. पी. मिश्रा ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया. उन्होंने बच्चों में गुर्दा रोग के समय पर और प्रभावी उपचार के लिए अधिक संख्या में शिशु रोग विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यशाला के आयोजन सचिव डॉ. स्वर्णिम ने हेमोडायलिसिस में एंटीकोआगुलेशन के उपयोग पर नवीनतम जानकारी साझा की. चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अनूप कुमार ने इसे रोगी देखभाल की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। प्रशिक्षण सत्र वरिष्ठ संकाय सदस्यों द्वारा संचालित किए गए, जिनमें डॉ. अरुण प्रसाद, डॉ. अमरेश कृष्णा, डॉ. मेघा सैगल, डॉ. आनंद कुमार, डॉ. डेबोलिना दास गुप्ता, डॉ. अंजलि तोमर और डॉ. रूपल गुप्ता शामिल थे. यह कार्यशाला बिहार और आसपास के क्षेत्रों में बाल गुर्दा रोग सेवाओं को सुदृढ़ करने तथा शिशु रोग विशेषज्ञों की क्षमता वृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।
