पटना, (न्यूज़ क्राइम 24) पाटलिपुत्र विश्विद्यालय पटना के स्नातकोत्तर प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा “प्राचीन भारत के सिक्के” विषय पर शुक्रवार को विभागीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त संगोष्ठी का उद्देश्य विद्यार्थियों में प्राचीन सिक्कों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक एवं आर्थिक धरोहर से परिचय कराते हुए इतिहास निर्माण के प्रमुख आधारों में से एक सिक्कों की महत्ता के बारे में अवगत कराना था, इसके साथ ही मुद्राशास्त्र के क्षेत्र में अनुसंधान हेतु विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना भी था।कार्यक्रम का आरंभ करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. कनक भूषण मिश्रा ने प्राचीन भारत के सिक्कों की परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सिक्कों का इतिहास बहुत समृद्ध और रोचक है।
इसका विकास हमारे राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है।सिक्कों की परंपरा का आरंभ लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से माना जाता है।भारत के प्राचीनतम सिक्के आहत सिक्के कहे जाते है क्योंकि इन पर चिह्न आहत करके अंकित किए जाते थे।ये प्रायः चाँदी से बने होते थे और महाजनपद युग व मौर्य काल में प्रचलित रहे।इसके बाद से भारत में नियमित रूप से सिक्कों का प्रचलन विविध कालों में दिखाई पड़ता है जो अपने साथ विविध कालों की सांस्कृतिक इतिहास को प्रतिबिंबित करते हैं। कार्यक्रम का संचालन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ प्रीति गुप्ता के द्वारा किया गया।उन्होने सिक्कों की महत्ता तथा ऐतिहासिक स्रोत के रूप में उनकी प्रासंगिकता की चर्चा करते हुए उनकी उत्पत्ति तथा प्राचीनता पर प्रकाश डाला तथा बताया कि कई बार जहाँ शिलालेख या साहित्य मौन रहते हैं, वहाँ सिक्के ठोस प्रमाण प्रस्तुत कर इतिहास के अंधकार युग को प्रकाशित कर चुके हैं।
कार्यक्रम में स्नातकोत्तर सेमेस्टर प्रथम एवं तृतीय के छात्र छात्राओं ने ऐतिहासिक कालखंडों के विविध राजवंशों के द्वारा जारी किए गए सिक्कों को आधार बनाकर अपनी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के अंत में डॉ तृप्ति राय ने सिक्कों के विकास के विविध चरणों पर प्रकाश डालते हुए उन सिक्कों पर अंकित विविध चिन्हों एवं सिक्कों की निर्माण तकनीक की जानकारी छात्र छात्राओं की दी तथा बताया कि जहां सिक्कों से शासकों के नाम, उपाधि, शासनकाल और वंश का ज्ञान मिलता है वहीं धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) के उपयोग से उस काल की आर्थिक समृद्धि और व्यापारिक स्थिति समझी जा सकती है जहां सिक्कों पर देवी-देवताओं, प्रतीकों और धार्मिक चिन्हों का अंकन उस काल की धार्मिक प्रवृत्तियों को दर्शाता है वही सिक्कों की ढलाई, चित्रांकन और लिपि उस समय की कलात्मक क्षमता और तकनीकी ज्ञान को दर्शाते हैं। उक्त कार्यक्रम में रौशन,प्रिया,शिवानी,रोहित,सुरजीत,रजनी,ममता कुमारी,भारती कुमारी,सोनी कुमारी इत्यादि छात्र छात्राओं की प्रतिभागिता रही।
