बिहार

गर्भावस्था के दौरान ब्लडशुगर के स्तर को नियंत्रित रखना जरूरी

अररिया, रंजीत ठाकुर। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। इस दौरान कुछ महिलाओं का ब्लड शुगर लेवल काफी बढ़ जाता है। इसे गर्भकालीन डायबिटीज यानी गेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। बच्चा जन्म लेने के बाद ये बीमारी आमतौर पर खत्म हो जाती है। लेकिन इससे गर्भावस्था के दौरान कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। लिहाजा गर्भावस्था के दौरान ब्लड शुगर लेवल का नियंत्रित होना जरूरी है। वर्ष 2014 में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन द्वारा किये गये एक सर्वे में पाया गया कि अधिक उम्र में मां बनना, वजनी महिलाएं, पूर्व में इससे जुड़ी शिकायत या परिवार में किसी व्यक्ति के डायबिटीक होने पर इसका खतरा अधिक होता है।

गर्भस्थ बच्चे की सेहत होती है प्रभावित-

जिला प्रतिरक्षण पदाधिकरी सह सदर अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक डॉ राजेंद्र कुमार ने बताया कि ब्लडशुगर अनियंत्रित रहने से समय से पूर्व बच्चे के जन्म का खतरा काफी बढ़ जाता है। गर्भ में बच्चे को उनकी मां से ही सभी तरह का पोषण मिलता है। मां का शुगर अधिक रहने पर बच्चे का सही से पोषण नहीं हो पाता। बच्चे का शुगर लेवल भी बढ़ जाता है। जो फैट के रूप में जमा होने लगता है। इसके प्रभाव से बच्चा का वजन बढ़ता है। समय से पूर्व प्रसव का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, बच्चे का पीलिया से ग्रसित होने, सांस से जुड़ी तकलीफ के साथ-साथ बच्चों में मोटापा की आशंका रहती है।

ब्लडशुगर नियंत्रित रखने के लिये करें जरूरी पहल-

Advertisements
Ad 1

गर्भावस्था के दौरान ब्लडशुगर को नियंत्रित रखने के लिये जरूरी है कि गर्भवती महिलाएं अपने खान पान पर समुचित ध्यान दें। सक्रिय जीवनशैली, चिकित्सकीय देखभाल, ब्लडशुगर लेवल की समुचित निगरानी जरूरी है। प्रसव पूर्व चार एएनसी जांच को उन्होंने इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण बताया। कार्बोहाइड्रेड का कम सेवन, कोल्डड्रिंक, मिठाई व चाय के अत्यधिक सेवन से उन्होंने परहेज करने की सलाह दी।

नियमित जीवनशैली व संतुलित आहार से बचाव संभव-

सिविल सर्जन डॉ विधानचंद्र सिंह बताते हैं कि आज कल हर आयु वर्ग के लोग डायबिटीज से प्रभावित हो रहे हैं। अनियमित दिनचर्या व खानपान, शारीरिक श्रम से दूरी, तनाव सहित कई अन्य कारणों से लोग तेजी से इसका शिकार हो रहे हैं। इसलिये समय समय पर ब्लडशुगर लेवल की जांच जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान तो ये और भी जरूरी हो जाता है। क्योंकि इस दौरान शुगर लेवल बढ़ने का नकारात्मक प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। बचाव के लिये महिलाओं को हल्के फुल्के व्यायाम को अपने जीवनशैली में शामिल करना चाहिये। वजन को नियंत्रित रखने, खान- पान में समुचित हरी पत्तेदार सब्जी व फल का अधिक से अधिक उपयोग के साथ साथ समय- समय पर सेहत की समुचित जांच से इससे बचाव संभव है।

Related posts

कृषि उत्पादन बाजार प्रांगण का अत्याधुनिक कायाकल्प किसानों व्यापारियों को मिलेगी आधुनिक सुविधाएं – राम कृपाल यादव

“Run for Nasha Mukt Bihar” के संदेश के साथ 15 मार्च को पटना मैराथन 2026 का आयोजन

शेखपुरा में विकास योजनाओं की समीक्षा बैठक, उप विकास आयुक्त ने दिए निर्देश

error: