फुलवारीशरीफ, अजीत। विश्व ग्लूकोमा सप्ताह के अवसर पर एम्स पटना के नेत्र रोग विभाग की ओर से 9 और 10 मार्च को मरीजों और आम लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ग्लूकोमा जैसी गंभीर आंखों की बीमारी के प्रति लोगों को सतर्क करना और समय पर जांच कराने के महत्व को समझाना था।
10 मार्च को एम्स पटना के ओपीडी फोयर क्षेत्र में “यूनिटिंग फोर अ ग्लूकोमा फ्री वर्ल्ड” थीम के तहत जागरूकता कार्यक्रम और नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत नेत्र रोग विभाग के प्रो. डॉ. अमित राज के स्वागत भाषण से हुई. उन्होंने कहा कि ग्लूकोमा अपरिवर्तनीय अंधत्व का एक बड़ा कारण है और समय पर पहचान ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। इस मौके पर ट्रॉमा और इमरजेंसी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार के नेतृत्व में टीम ने नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया. नाटक के माध्यम से लोगों को रचनात्मक तरीके से यह संदेश दिया गया कि नियमित नेत्र परीक्षण कराकर ग्लूकोमा जैसी बीमारी की समय रहते पहचान की जा सकती है और अंधत्व से बचा जा सकता है.
एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने कहा कि जागरूकता की कमी के कारण करीब 90 प्रतिशत ग्लूकोमा के मामले समय पर सामने नहीं आ पाते. उन्होंने इस तरह के जनजागरूकता कार्यक्रमों की सराहना करते हुए लोगों से नियमित आंखों की जांच कराने की अपील की। चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. अनुप कुमार ने कहा कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को नियमित और विस्तृत नेत्र परीक्षण कराना चाहिए. इससे ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षणों का पता चल सकता है और स्थायी दृष्टि हानि से बचाव संभव है। प्रभारी डीन (शैक्षणिक) प्रो. डॉ. संजय पांडेय ने भी इस पहल की सराहना करते हुए लोगों से अपने परिवार और आसपास के लोगों के बीच ग्लूकोमा के बारे में जागरूकता फैलाने का आग्रह किया।
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. भावेश चंद्र साहा ने बताया कि 40 वर्ष से अधिक आयु के लोग, मधुमेह के मरीज, ज्यादा नंबर का चश्मा लगाने वाले, जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास रहा हो या जिन्होंने लंबे समय तक स्टेरॉयड का इस्तेमाल किया हो, उनमें इस बीमारी का खतरा अधिक होता है. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए.
उन्होंने यह भी बताया कि नवजात शिशुओं में आंखों का असामान्य रूप से बड़ा होना, आंखों से ज्यादा पानी आना या तेज रोशनी से परेशानी होना जन्मजात ग्लूकोमा के संकेत हो सकते हैं. ऐसे मामलों में तुरंत विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।
कार्यक्रम में एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. उमेश भदानी, प्रो. डॉ. बिनय कुमार, न्यूक्लियर मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार और न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद कुमार राय सहित कई वरिष्ठ चिकित्सक मौजूद रहे. सभी ने सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया। इस दौरान नेत्र रोग विभाग के डॉक्टर, रेजिडेंट चिकित्सक, ऑप्टोमेट्रिस्ट, नर्सिंग अधिकारी और अन्य कर्मचारियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई.
कार्यक्रम के अंत में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिव्या केसर्वानी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इससे पहले 9 मार्च को नेत्र विज्ञान विभाग के मरीज प्रतीक्षालय में भी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 200 मरीजों और उनके परिजनों ने भाग लिया. जूनियर रेजिडेंट डॉ. तरेता बिस्वास ने वीडियो प्रेजेंटेशन के माध्यम से ग्लूकोमा के कारण, लक्षण, जोखिम और बचाव के उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉक्टरों ने बताया कि नियमित नेत्र परीक्षण और समय पर निदान ही ग्लूकोमा से होने वाली स्थायी दृष्टि हानि को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है।
