फुलवारीशरीफ़, अजित। बच्चों की मुस्कान, उनकी पढ़ाई और उज्ज्वल भविष्य की शुरुआत अक्सर सुनने की शक्ति से होती है. इसी अहम संदेश को समाज तक पहुंचाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) पटना के ईएनटी (नाक-कान-गला) विभाग की ओर से विश्व श्रवण दिवस 2026 के मौके पर विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष की वैश्विक थीम “समुदाय से कक्षा तक: सभी बच्चों के लिए सुनने की देखभाल” रखी गई है. कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चों की सुनने की क्षमता उनके भाषा विकास, पढ़ाई और आत्मविश्वास के लिए बेहद जरूरी होती है. अगर सुनने में किसी तरह की समस्या को समय रहते पहचान लिया जाए और इलाज शुरू कर दिया जाए, तो बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है और अपने सपनों को पूरा कर सकता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एम्स पटना के डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. संजीब कुमार घोष ने कहा कि कई बार लोग बच्चों में सुनने से जुड़ी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि समय पर जांच और इलाज से बच्चे का पूरा भविष्य बदल सकता है. उन्होंने अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लोगों से अपील की कि अगर बच्चों में सुनने की समस्या के शुरुआती संकेत दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं। यह कार्यक्रम एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल और मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. डॉ. अनुप कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया. वहीं ईएनटी विभाग की अध्यक्ष प्रो. डॉ. क्रांति भावना और डॉ. विजय कुमार के नेतृत्व में विशेषज्ञों ने बच्चों की सुनने की समस्याओं के आधुनिक इलाज और जागरूकता की जरूरत पर विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए छात्रों के बीच निबंध लेखन, क्विज, पोस्टर मेकिंग और पेंटिंग प्रतियोगिताएं भी कराई गईं. इस दौरान एक नुक्कड़ नाटक भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें सुनने में असमर्थ बच्चों की रोजमर्रा की परेशानियों और इलाज में देरी के असर को दिखाया गया. इस प्रस्तुति ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया और सभी को इस मुद्दे के प्रति गंभीर होने का संदेश दिया। कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि एम्स पटना का ईएनटी विभाग अब तक सरकारी योजनाओं के तहत 400 से अधिक सफल कोकलियर इंप्लांट सर्जरी कर चुका है. इन सर्जरी के जरिए ऐसे बच्चों को सुनने और बोलने की नई उम्मीद मिली है, जो पहले इस क्षमता से वंचित थे। कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर जांच, आधुनिक इलाज और समाज में जागरूकता के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हर बच्चा न केवल सुन सके, बल्कि पढ़-लिख कर आगे बढ़ सके और अपने जीवन के सपनों को पूरा कर सके।
