बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में आठवां अनुसन्धान परिषद आयोजित, तकनीकी नवाचार पर हुआ मंथन

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>फुलवारीशरीफ&comma; अजित।<&sol;strong> बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के शोध निदेशालय द्वारा सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में आठवें अनुसन्धान परिषद का आयोजन किया गया&period; इस वर्ष परिषद की विषयवस्तु &OpenCurlyDoubleQuote;तकनीकी नवाचार के माध्यम से पशुपालन&comma; डेयरी एवं मत्स्य क्षेत्र में परिवर्तन” रखी गई थी&period; कार्यक्रम में पशु विज्ञान&comma; डेयरी एवं मत्स्य आधारित शोध को अधिक व्यवहारिक&comma; व्यवसायिक और तकनीक आधारित बनाने पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत निदेशक अनुसन्धान डॉ&period; नरेश कुमार सिंह के स्वागत भाषण से हुई&period; उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य शोध को समाज और किसानों की जरूरतों से जोड़ना है तथा गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ&period; इन्द्रजीत सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब शोध के क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बना रही है&period; उन्होंने शिक्षकों और शोधार्थियों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता में दक्ष बनने का आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षा&comma; अध्ययन और अनुसंधान को अधिक गहन&comma; व्यापक और तथ्यात्मक बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी&period; उन्होंने कहा कि समय के साथ कदम नहीं मिलाने वाले लोग पीछे रह जाएंगे&period;<br>कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद वर्ल्ड वेटरनरी पोल्ट्री एसोसिएशन इंडिया के अध्यक्ष डॉ&period; जितेन्द्र वर्मा ने कहा कि केवल पुस्तक आधारित शोध पर्याप्त नहीं है&period; शोध ऐसा होना चाहिए जिसका लाभ समाज और उद्योग दोनों को मिल सके तथा जिसे व्यवसायिक रूप दिया जा सके&period; <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>उन्होंने संपर्क व्यवस्था मजबूत करने और व्यावहारिक शोध को बढ़ावा देने पर जोर दिया। प्रगतिशील मत्स्य किसान हरिमोहन सिंह ने कहा कि बिहार का जल संसाधन मत्स्य पालन के लिए काफी उपयुक्त है&period; उन्होंने बकरी पालन को किसानों और पशुपालकों के लिए बेहतर आय का स्रोत बताते हुए सहजन के पत्तों को बकरी के आहार में शामिल करने की सलाह दी&period; साथ ही सरकार से शीरे पर लगे प्रतिबंध हटाने की मांग की ताकि पशु आहार उद्योग को बढ़ावा मिल सके। हाई टेक न्यूट्रीसोल प्राइवेट लिमिटेड&comma; हाजीपुर के प्रबंध निदेशक पवन ने कहा कि शोध कार्य वर्तमान व्यावसायिक मानकों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए&period; उन्होंने पशुओं में रोग निदान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और अधिक आर्द्रता नियंत्रण को महत्वपूर्ण शोध क्षेत्र बताया। भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान&comma; मुक्तेश्वर के संयुक्त निदेशक डॉ&period; यशपाल सिंह मलिक ने उद्योग और बाजार से नियमित सर्वेक्षण तथा सुझाव लेकर बेहतर तकनीक और उत्पाद विकसित करने पर बल दिया&period;<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>वहीं केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान&comma; हिसार के प्रधान वैज्ञानिक डॉ&period; अशोक कुमार बलहारा ने कहा कि देश में पशुधन की संख्या अच्छी है&comma; लेकिन दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है&period; इसके लिए लिंग चयनित वीर्य के उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ&period; निर्मल सिंह दहिया ने कहा कि विश्वविद्यालय किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से शोध को आगे बढ़ा रहा है&period; उन्होंने समेकित कृषि मॉडल पर कार्य करने की आवश्यकता बताई। निदेशक आवासीय निर्देश-सह-अधिष्ठाता स्नातकोत्तर शिक्षा डॉ&period; पंकज कुमार सिंह ने कहा कि शोध की गुणवत्ता बेहतर बनाने के लिए बहुविषयक अनुसंधान&comma; उद्योग संपर्क और क्षेत्र आधारित अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। बिहार वेटेरिनरी कॉलेज&comma; पटना के अधिष्ठाता डॉ&period; पल्लव शेखर ने कहा कि पशु चिकित्सा शिक्षा और शोध को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है ताकि इसका सीधा लाभ किसानों और पशुपालकों तक पहुंच सके।<&sol;p>&NewLine;

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