पटना विमेंस कॉलेज की डॉ. स्मिता कुमारी को थाईलैंड में मिला ‘संस्कृत रत्न’ सम्मान

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पटना&comma; &lpar;न्यूज़ क्राइम 24&rpar; <&sol;strong>संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पटना विमेंस कॉलेज की कला एवं मानविकी संकायाध्यक्ष तथा संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ&period; स्मिता कुमारी को थाईलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में &OpenCurlyQuote;संस्कृत रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया गया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>ग्लोबल संस्कृत फोरम&comma; भारत&comma; संस्कृत स्टडीज सेंटर&comma; फैकल्टी ऑफ आर्कियोलॉजी&comma; सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी&comma; बैंकॉक तथा थाई भारत कल्चर लॉज के संयुक्त तत्वावधान में 28 से 30 सितंबर तक सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का मुख्य विषय &OpenCurlyQuote;भारतीय ज्ञान प्रणालियां &colon; संस्कृतियों एवं ज्ञान परंपराओं के मध्य सेतु’ था। डॉ&period; स्मिता कुमारी को सम्मेलन में विशेष वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>सम्मेलन आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी&comma; बैंकॉक के वरिष्ठ प्रोफेसर चिरापत प्रपन्नविद्या &lpar;पद्मश्री&rpar; ने डॉ&period; स्मिता कुमारी को अंगवस्त्र&comma; सम्मान पत्र एवं प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>डॉ&period; स्मिता कुमारी ने सम्मेलन में &OpenCurlyQuote;भारतीय दर्शनेषु व्यक्तित्वविकासस्य विवेचनम्’ विषय पर संस्कृत में व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय दर्शन में व्यक्तित्व विकास की अवधारणा को बाह्य आडंबर और मिथ्या लोकप्रियता से अलग बताते हुए इसे विश्वचेतना के प्रति मानव की आत्मा के आंतरिक एवं क्रमबद्ध विकास से जोड़ा।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>उन्होंने कहा कि अंत&colon;करण के परिमार्जन&comma; चित्त की शुद्धि&comma; त्रिगुणों के सामंजस्य और आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से व्यक्ति मानसिक स्थिरता एवं बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यह प्रक्रिया सामाजिक समरसता का भी आधार बनती है। सम्मेलन में थाईलैंड में भारत के राजदूत पुनीत अग्रवाल&comma; सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एवं आयोजन समिति के सदस्य सहित भारत&comma; अमेरिका&comma; जर्मनी&comma; थाईलैंड समेत विभिन्न देशों से आए संस्कृत विद्वान और प्रतिभागी मौजूद रहे।<&sol;p>&NewLine;

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