राहुल गांधी से पहले सम्पत चक के भोगीपुर के बच्चों ने देखी ‘फुले’ : गांव की मिट्टी से उठी सामाजिक क्रांति की मशाल

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>फुलवारी शरीफ&comma; अजित कुमार &colon;<&sol;strong>  जहाँ एक ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने हाल ही में पटना में सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की पीड़ा पर आधारित फिल्म &OpenCurlyQuote;फुले’ को देखकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया&comma; वहीं पटना जिले के संपतचक प्रखंड के छोटे से गांव भोगीपुर &lpar;एकतापुरम&rpar; में यह फिल्म पहले ही 27 अप्रैल को बच्चों और उनके अभिभावकों को दिखाई जा चुकी थी&period;<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>&OpenCurlyQuote;फुले’ केवल एक फिल्म नहीं&comma; बल्कि यह एक विचार&comma; एक आंदोलन और एक वैचारिक क्रांति की शुरुआत है&comma; जो राजधानी की स्क्रीन से पहले गांव की मिट्टी में आकार ले रही है&period;<br &sol;>राहुल गांधी द्वारा फिल्म देखना जहां राष्ट्रीय स्तर पर एक सामाजिक प्रतिबद्धता का संकेत है&comma; वहीं भोगीपुर के बच्चों का इसे पहले देखना यह दर्शाता है कि असली सामाजिक चेतना जनता की जड़ों में पल रही है — मंचों या सभाओं में नहीं&period;जहाँ राहुल गांधी का फिल्म देखना राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है और यह संकेत देता है कि कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सजग है&comma; वहीं भोगीपुर की यह पहल यह दर्शाती है कि समाज सुधार की मशाल नेताओं के पहले आम जनता ने थाम ली है&period;<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>वहीं 95 वर्षीय वयोवृद्ध समाजसेवी बाबू सुखदेव सिंह का कहना है&comma; &OpenCurlyDoubleQuote;बदलाव की शुरुआत संसद या किताबों से नहीं&comma; बल्कि बच्चों के मन और मां की गोद से होती है&period;फुले दंपति के आदर्शों को यदि अगली पीढ़ी आत्मसात करे&comma; तभी सच्चा परिवर्तन संभव है&period;<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>यह ऐतिहासिक पहल &OpenCurlyDoubleQuote;मिशन नौनिहाल सम्मान” के अंतर्गत सम्पन्न हुई&comma; जो बच्चों को नि&colon;शुल्क पठन-पाठन सामग्री उपलब्ध कराने वाली एक सामाजिक संस्था है&period;इस संस्था का संचालन बाबू सुखदेव सिंह के नेतृत्व में हो रहा है&comma; जिन्हें सर्वोच्च मानवाधिकार संरक्षण सम्मान प्राप्त है और जो यूनिसेफ के स्थायी सहयोगी सदस्य भी हैं&period;उन्होंने यह साबित किया है कि सामाजिक क्रांति केवल बड़े मंचों से नहीं&comma; बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवेदनशील प्रयासों से ही पहुँचती है&period;<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>&OpenCurlyQuote;फुले’ फिल्म महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन संघर्ष और समाज सुधार में योगदान पर आधारित है&period;यह फिल्म मनोरंजन नहीं&comma; बल्कि सामाजिक जागरूकता और प्रेरणा का माध्यम है&period;संपतचक नगर परिषद वार्ड संख्या 14 के अंतर्गत भोगीपुर &lpar;एकतापुरम&rpar; में यह फिल्म विशेष रूप से गरीब&comma; उपेक्षित और दलित समुदाय के बच्चों और उनकी माताओं को दिखाई गई&period;<&sol;p>&NewLine;

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