जहां घरों में होते थे 40 प्रतिशत से ज्यादा प्रसव, वही पंचायतें बन रही देश में नजीर

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पूर्णिया&comma; &lpar;न्यूज़ क्राइम 24&rpar;<&sol;strong> पहले बच्चे के जन्म के समय मैंने घर पर प्रसव कराया था। उस समय अनजाने में अपनी और बच्चे दोनों की जान जोखिम में डाल दी थी। दाई बार-बार कह रही थी कि सब ठीक है&comma; लेकिन मेरा खून बहना बंद नहीं हो रहा था। दूसरे बच्चे के समय मैंने सरकारी अस्पताल में प्रसव कराया। वहां डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने जिस तरह सुरक्षा और देखभाल दी&comma; वैसा भरोसा घर पर कभी नहीं मिल सकता था।&&num;8221&semi;<br>मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड के बाघा खाल गांव की नीलम देवी का यह अनुभव केवल एक महिला की कहानी नहीं&comma; बल्कि बिहार में हो रहे एक बड़े सामाजिक बदलाव की तस्वीर है। जिस राज्य के अनेक गांवों में कभी घर पर प्रसव सामान्य परंपरा माना जाता था&comma; वहीं आज वही पंचायतें सुरक्षित मातृत्व का राष्ट्रीय मॉडल बन रही हैं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>करीब दो वर्ष पहले तक बिहार के 11 जिलों के 27 प्रखंडों की 80 पंचायतों में 40 प्रतिशत से अधिक प्रसव घरों में होते थे। जागरूकता की कमी&comma; स्वास्थ्य संस्थानों की दूरी&comma; समय पर परिवहन नहीं मिल पाना और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक मान्यताएं इसकी प्रमुख वजह थीं। अधिकांश परिवार प्रसव को अस्पताल के बजाय घर की परंपरा मानते थे&comma; जिससे मां और नवजात दोनों की जान अनावश्यक जोखिम में पड़ जाती थी। इसी चुनौती को बदलने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने इसे केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा&comma; बल्कि सामाजिक व्यवहार परिवर्तन का अभियान बनाया। <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>आशा&comma; आशा फैसिलिटेटर&comma; एएनएम और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों &lpar;सीएचओ&rpar; का विशेष उन्मुखीकरण किया गया। मुखिया&comma; वार्ड सदस्य और अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधियों को गांव-गांव में घरेलू प्रसव के कारणों की पहचान कर समाधान विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई। गर्भवती महिलाओं की नियमित ट्रैकिंग&comma; प्रसव पूर्व जांच&comma; संभावित प्रसव तिथि की निगरानी और समय पर स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पंचायत स्तर पर समन्वित व्यवस्था विकसित की गई। लगातार प्रयास&comma; समुदाय की भागीदारी और जवाबदेह निगरानी का परिणाम यह हुआ कि जिन पंचायतों में कभी 40 प्रतिशत से अधिक प्रसव घरों में होते थे&comma; वहां आज घरेलू प्रसव घटकर केवल 5 से 8&period;5 प्रतिशत के बीच रह गया है। यही 80 पंचायतें अब &&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; मॉडल के रूप में देशभर का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>मुजफ्फरपुर मॉडल &colon; तीन स्तंभों पर खड़ी हुई &&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; पंचायतों की सफलता &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>इस परिवर्तन की सबसे मजबूत मिसाल मुजफ्फरपुर ने पेश की। जिले की 19 पंचायतों में घरेलू प्रसव घटकर महज 2 प्रतिशत रह गया है। यह उपलब्धि किसी एक योजना का परिणाम नहीं&comma; बल्कि तीन मजबूत स्तंभों—समुदाय की सक्रिय भागीदारी&comma; पंचायत स्तर पर जवाबदेह निगरानी और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़े विश्वास—की बदौलत संभव हुई।<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>पहला स्तंभ था समुदाय की भागीदारी। आशा कार्यकर्ताओं&comma; एएनएम&comma; सीएचओ और पंचायत प्रतिनिधियों ने घर-घर जाकर परिवारों से संवाद किया। गर्भवती महिलाओं की पहचान&comma; नियमित जांच और समय पर अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से निभाई गई।<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड की बाघा खाल पंचायत की मुखिया विभा कुमारी बताती हैं&comma; &&num;8220&semi;सबसे बड़ी चुनौती लोगों की वर्षों पुरानी सोच बदलना था। हमने हर घर जाकर समझाया कि अस्पताल में प्रसव ही मां और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षित है। पंचायत ने जरूरत पड़ने पर वाहन और आशा कार्यकर्ताओं को हर संभव सहयोग दिया। आज हमारी पंचायत में कोई भी प्रसव घर पर नहीं होता। यह पूरे गांव की सामूहिक जीत है।&&num;8221&semi;<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>दूसरा स्तंभ था जवाबदेह निगरानी। अधिकारियों की नियमित फील्ड विजिट&comma; सतत समीक्षा और पंचायत स्तर तक निगरानी ने स्वास्थ्यकर्मियों में जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। अभियान केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहा&comma; बल्कि गांवों में उसकी निरंतर मौजूदगी दिखाई दी।<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बना सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता विश्वास। एंबुलेंस की उपलब्धता&comma; बेहतर रेफरल व्यवस्था&comma; स्वास्थ्य संस्थानों में सुविधाओं का विस्तार और महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार ने ग्रामीण परिवारों का भरोसा मजबूत किया। धीरे-धीरे वर्षों पुरानी घरेलू प्रसव की सामाजिक मान्यताएं कमजोर पड़ती गईं और संस्थागत प्रसव गांवों में नई सामाजिक स्वीकृति बन गया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन डॉ&period; सुधीर कुमार के अनुसार&comma; घरेलू प्रसव को महज 2 प्रतिशत तक सीमित करना केवल प्रशासनिक आंकड़ा नहीं&comma; बल्कि जनभागीदारी और प्रशासनिक प्रतिबद्धता का उदाहरण है। उनका कहना है कि आशा कार्यकर्ताओं&comma; एएनएम&comma; सीएचओ और स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों ने घर-घर जाकर लोगों की वर्षों पुरानी सोच बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर जनता का बढ़ता विश्वास और स्वास्थ्य टीम की निरंतर मैदानी मौजूदगी ने इस बदलाव को जमीन पर उतारा है। उनके मुताबिक&comma; यह मॉडल दिखाता है कि नीयत और प्रयास समन्वित हों तो सुरक्षित मातृत्व का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>जमीनी मौजूदगी ने कर्मचारियों में पैदा की जवाबदेही&comma; ग्रामीणों में बढ़ाया विश्वास &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>अधिकारियों की नियमित फील्ड विजिट इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। समीक्षा बैठकों से आगे बढ़कर गांवों में लगातार मौजूदगी ने स्वास्थ्यकर्मियों में जवाबदेही पैदा की और ग्रामीण परिवारों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा मजबूत किया। मुजफ्फरपुर की सफलता के बाद यही मॉडल अन्य जिलों में भी अपनाया गया और वहां भी उल्लेखनीय परिणाम सामने आए। सारण जिले के पानापुर प्रखंड की बसहियां और कोंध पंचायतें&comma; जहां एक वर्ष पहले तक लगभग 45 प्रतिशत प्रसव घरों में होते थे<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p> आज सुरक्षित मातृत्व का नया उदाहरण बन चुकी हैं। जिलाधिकारी अमन समीर की निगरानी में ग्राम पंचायत फैसिलिटेशन टीम का गठन किया गया। कोंध पंचायत के मुखिया अमरेंद्र सिंह और बसहियां की मुखिया हीरा देवी के नेतृत्व में स्वास्थ्यकर्मियों ने घर-घर जाकर परिवारों से संवाद किया और संस्थागत प्रसव को सामुदायिक जिम्मेदारी बनाया। उधर किशनगंज के बहादुरगंज&comma; दिघलबैंक&comma; टेढ़ागाछ&comma; पोठिया&comma; कोचाधामन और ठाकुरगंज जैसे दूरस्थ प्रखंडों की अनेक पंचायतों में संस्थागत प्रसव 95 से 100 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यह दर्शाता है कि जब स्थानीय प्रशासन&comma; पंचायत और स्वास्थ्य व्यवस्था एक साथ काम करते हैं&comma; तो भौगोलिक कठिनाइयां भी सुरक्षित मातृत्व के रास्ते में बाधा नहीं बनतीं।<br>लखीसराय की हालिया स्वास्थ्य समीक्षा भी इसी दिशा की पुष्टि करती है। जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार के निर्देश पर संस्थागत प्रसव को शत-प्रतिशत करने के लिए नियमित समीक्षा की जा रही है। जननी बाल सुरक्षा योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य संस्थानों में सुविधाओं का विस्तार तथा एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है&comma; ताकि किसी भी गर्भवती महिला को आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचने में कठिनाई न हो।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>सुरक्षित प्रसव केवल सुविधा नहीं&comma; जीवन बचाने की अनिवार्य कड़ी &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>&&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; पंचायतों की अवधारणा केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं&comma; बल्कि सुरक्षित मातृत्व की बुनियादी जरूरतों से जुड़ा बदलाव है। प्रसव के दौरान अचानक उत्पन्न होने वाली जटिलताओं के कारण कुछ ही समय में मां या नवजात की स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी&comma; आवश्यक दवाएं&comma; रक्त की उपलब्धता&comma; ऑपरेशन और नवजात को तत्काल जीवनरक्षक देखभाल जैसी सुविधाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>पटना एम्स में एडिशनल प्रोफेसर व स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ&period; इंदिरा प्रसाद कहती हैं कि संस्थागत प्रसव मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य सुरक्षा की अनिवार्य नींव है। उनके अनुसार&comma; प्रसव के दौरान उत्पन्न होने वाली आपातकालीन जटिलताओं&comma; विशेषकर पोस्टपार्टम हेमरेज&comma; का सही प्रबंधन आधुनिक चिकित्सालयों में ही प्रभावी ढंग से संभव है।<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>डॉ&period; प्रसाद के मुताबिक&comma; बिहार की 80 पंचायतों का &&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; मॉडल यह दिखाता है कि सामाजिक व्यवहार परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवाओं का समन्वय मातृ मृत्यु दर को कम करने में प्रभावी हो सकता है। उनके अनुसार&comma; सुरक्षित मातृत्व की दिशा में यह पहल पूरे देश के लिए अनुकरणीय उपलब्धि है।<br>शोध भी बताते हैं कि सुरक्षित प्रसव का रास्ता अस्पताल से होकर जाता है। &&num;8220&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8221&semi; पंचायतों की कहानी यह भी बताती है कि संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना केवल सरकारी लक्ष्य पूरा करना नहीं&comma; बल्कि मां और नवजात की सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी संस्थागत प्रसव और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी को मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य परिणामों में सुधार से जोड़ा गया है।<br>प्रसव के दौरान होने वाली अप्रत्याशित जटिलताएं&comma; विशेषकर पोस्टपार्टम हेमरेज&comma; प्रसव संबंधी अन्य आपात स्थितियां और नवजात संक्रमण जैसी परिस्थितियों का समय पर प्रबंधन स्वास्थ्य संस्थानों में अधिक सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आशा कार्यकर्ताओं&comma; आंगनवाड़ी सेविकाओं और जीविका दीदियों के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान नियमित एंटेनटल केयर&comma; निरंतर सामुदायिक संवाद और व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया उतनी ही आवश्यक है। जब स्वास्थ्य केंद्रों पर महिलाओं को सम्मानजनक देखभाल मिलती है&comma; नवजात को जन्म के पहले घंटे यानी &&num;8216&semi;गोल्डन आवर&&num;8217&semi; में जीवनरक्षक सेवाएं उपलब्ध होती हैं और परिवारों को सकारात्मक अनुभव मिलता है&comma; तब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति पूरे समुदाय का विश्वास मजबूत होता है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>केवल स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं&comma; सामाजिक परिवर्तन की मिसाल &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>बिहार की 80 &&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; पंचायतों की कहानी यह साबित करती है कि सुरक्षित मातृत्व केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने से सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए समुदाय का विश्वास&comma; स्थानीय नेतृत्व&comma; जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था और निरंतर सामाजिक संवाद समान रूप से आवश्यक हैं। आज जिन गांवों में कभी घर पर प्रसव एक परंपरा माना जाता था&comma; वहीं अस्पताल में सुरक्षित प्रसव सामाजिक स्वीकृति और सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। मुजफ्फरपुर ने इस परिवर्तन की दिशा दिखाई&comma; जबकि सारण&comma; किशनगंज&comma; लखीसराय सहित अन्य जिलों ने इसे आगे बढ़ाया। यह बदलाव किसी एक योजना की सफलता भर नहीं&comma; बल्कि समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच बने नए विश्वास की कहानी है। बिहार की &&num;8216&semi;गृह प्रसव मुक्त&&num;8217&semi; पंचायतें आज यह संदेश दे रही हैं कि यदि स्थानीय नेतृत्व&comma; समुदाय की भागीदारी और जवाबदेह स्वास्थ्य तंत्र एक साथ काम करें&comma; तो दशकों पुरानी सामाजिक मान्यताएं भी बदली जा सकती हैं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>इसी बदलाव में इन 80 पंचायतों की असली कहानी छिपी है जहां कभी घर पर प्रसव मजबूरी&comma; परंपरा या सहज विकल्प था&comma; वहीं अब सुरक्षित संस्थागत प्रसव को परिवार और समुदाय दोनों स्वीकार कर रहे हैं। यही परिवर्तन इस पहल को महज एक स्वास्थ्य अभियान से आगे ले जाकर सुरक्षित मातृत्व और सामाजिक व्यवहार परिवर्तन का संभावित राष्ट्रीय मॉडल बनाता है।<&sol;p>&NewLine;

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