धार्मिक धरोहरों की अनवरत विनिष्टता निंदनीय : पं कन्हैया त्रिपाठी

&NewLine;<p><strong>वाराणसी&colon;<&sol;strong> साधु संतों व विद्वानों के चेतावनी वचनों को दरकिनार और अनदेखी करते हुए शासन-प्रशासन लगातार मनमानी कर रहे हैं। शास्त्रों की महत्ता को कुंठित करते हुए नासमझी&comma; अज्ञानता और नास्तिकता का परिचय देते हुए सरकारी अमला क्रूरता की सारे हदें पार कर रहा है। शकुन-अपशकुन&comma; पुण्य प्रताप के महात्म्य बेमानी सिद्ध हो गए हैं। जिसकी बानगी श्री काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ की कचहरी के समीप स्थित अति पुरातन अमोघ फलदायी अक्षय वट वृक्ष को धराशायी और हनुमान मंदिर को जीर्ण-शीर्ण अवस्था के रूप में देखने को मिल रही है। उक्त बातें &&num;8220&semi;अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा&&num;8221&semi; के महामंत्री&comma; &&num;8220&semi;काशी तीर्थ पुरोहित सभा&&num;8221&semi; के कार्यवाहक अध्यक्ष व &&num;8220&semi;गंगा सेवा समिति&&num;8221&semi; के अध्यक्ष पं कन्हैया त्रिपाठी शास्त्री ने गुरुवार को एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहीं। उन्होंने धार्मिक एवं शास्त्रीय धरोहरों की हो रही अनवरत विनिष्टता की घोर निंदा करते हुए इस पर रोक लगाने की अपील करते हुए कहा कि धार्मिक दृष्टिकोण से इतर मौजूदा कोरोना काल में जहाँ पूरा देश ऑक्सीजन की कमी झेल रहा है&comma; ऐसी विकट परिस्थितियों में भी ऑक्सीजन सप्लाई करने वाले वृक्षों की उखाड़ना कहाँ तक उचित है। वट&comma; पीपल&comma; नीम आदि ऑक्सीजन प्रदान करने वाले वृक्षों को बेदर्दी से धराशायी किया जा रहा है। उनकी जगह खोखले विकास और कंक्रीट के जंगलों की श्रृंखलाएं तैयार की जा रही हैं। जो धार्मिक दृष्टिकोण से भी बेहद अशुभ और अनिष्टकारी माना जाएगा। श्री त्रिपाठी ने कहा कि एक तरफ पर्यावरण को बचाने ज्यादा से ज्यादा ऑक्सिजन प्रदत्त वृक्षारोपण करने की बात हो रही है&comma; वहीं दूसरी ओर वृक्षों को विनिष्ट किया जा रहा है।<&sol;p>&NewLine;

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