सन 1818 से निकल रही माता की डाली खप्पड़ पूजा में उमड़ा हजारों श्रद्धालुओं का आस्था का जनसमुद्र

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>फुलवारीशरीफ&comma; अजीत।<&sol;strong> फुलवारी शरीफ के ऐतिहासिक संगत पर स्थित सैकड़ों साल पुराने माता मंदिर से रविवार की शाम साढ़े सात बजे माता की डाली खप्पड़ निकला&period; हाथों में पारंपरिक हथियार तलवार&comma; भाला&comma; लाठी&comma; डंडा और त्रिशूल लिए हजारों श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हुए नगर भ्रमण में शामिल हुए&period; खप्पड़ में हवन की अग्नि लिए मंदिर के पुजारी सबसे आगे दौड़ते रहे और उनके पीछे-पीछे हजारों श्रद्धालुओं का आस्था का विशाल सैलाब दौड़ता रहा&period; करीब डेढ़ किलोमीटर की नगर परिक्रमा पूरी करने के बाद लगभग आधे घंटे में खप्पड़ पुनः मंदिर परिसर पहुंचा&comma; जहां विधिवत पूजा-अर्चना के साथ यह ऐतिहासिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक फुलवारी शरीफ में प्रखंड मुख्यालय के सामने स्थित देवी माता मंदिर से श्रावण माह में हर वर्ष निकलने वाली माता की डाली यानी खप्पड़ पूजा को देखने और उसमें शामिल होने के लिए हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा&period; निर्धारित समय पर भव्य पूजन और हवन के बाद मंदिर के पुजारी खप्पड़ में हवन की प्रज्वलित अग्नि लेकर नगर परिक्रमा के लिए निकले।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>पुजारी के आगे बढ़ते ही उनके पीछे-पीछे हजारों महिला&comma; पुरुष&comma; युवा&comma; बुजुर्ग और बच्चे आस्था के सैलाब के रूप में दौड़ पड़े&period; कई श्रद्धालु अपने हाथों में पारंपरिक हथियार तलवार&comma; भाला&comma; लाठी&comma; डंडा और त्रिशूल लिए हुए थे&period; वहीं&comma; बड़ी संख्या में लोग अपने छोटे बच्चों को कंधे पर बैठाकर इस अद्भुत और ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने&period; चारों दिशाएं जय काली&comma; जय माता दी और माता के जयकारों से गूंजती रहीं।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>हवन की अग्नि के साथ की जाती है नगर परिक्रमा-<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>भव्य पूजन के बाद मंदिर के पुजारी खप्पड़ में हवन की अग्नि लेकर नगर परिक्रमा के लिए निकलते हैं&period; उनके पीछे हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ माता के जयकारे लगाते हुए दौड़ती है&period; परिक्रमा में शामिल श्रद्धालु भाला&comma; तलवार&comma; लाठी&comma; डंडा और त्रिशूल जैसे पारंपरिक हथियार लिए रहते हैं&period; लगभग डेढ़ किलोमीटर की नगर परिक्रमा के बाद खप्पड़ पुनः मंदिर परिसर पहुंचता है&comma; जहां पूजा संपन्न होती है&period; माता की डाली खप्पड़ निकलने से लेकर नगर भ्रमण और मंदिर वापस पहुंचने की पूरी प्रक्रिया करीब आधे घंटे में पूरी हो जाती है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>इस दौरान सड़कों पर दौड़ते हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ और उनके बीच माता के जयकारों का अद्भुत दृश्य देखने को मिला&period; डाली खप्पड़ पूजा में दौड़ लगाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या जितनी थी&comma; उससे कहीं अधिक लोग सड़कों के किनारे&comma; घरों की छतों और आसपास की इमारतों से इस ऐतिहासिक दृश्य को देखने के लिए जुटे रहे&period; आस्था के इस महासमुद्र को देखकर उपस्थित अपार जनसमूह हतप्रभ रह गया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पूजा से कई घंटे पहले से जुटने लगी थी श्रद्धालुओं की भीड़-<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>माता की डाली खप्पड़ पूजा को लेकर आयोजन शुरू होने से कई घंटे पहले ही मंदिर परिसर और आसपास के इलाके में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी&period; पूजा संपन्न होने के कई घंटे बाद तक श्रद्धालु प्रसाद लेने के लिए कतारों और भीड़ में जुटे रहे&period; मंदिर परिसर में दिनभर आस्था और श्रद्धा का माहौल बना रहा।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>देवी स्थान समिति के सचिव देवेंद्र प्रसाद ने बताया कि खप्पड़ पूजा ऐतिहासिक और अनोखी पूजा है&comma; जिसके सफल आयोजन में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग मिलकर अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं&period; उन्होंने बताया कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होने की मान्यता है&period; इस बार डाली खप्पड़ पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 70 हजार से भी अधिक रही।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>सन 1818 से चली आ रही है माता की डाली खप्पड़ पूजा की परंपरा-<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>खप्पड़ पूजा को लेकर प्रचलित मान्यता के अनुसार करीब दो सौ साल पहले फुलवारी शरीफ और आसपास के इलाकों में भयंकर महामारी फैल गई थी&period; महामारी की चपेट में आने से सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी और पूरे इलाके में भय और निराशा का माहौल था&period; मान्यता के अनुसार उस समय मंदिर के पुजारी झमेली बाबा को मां काली ने स्वप्न में दर्शन दिए थे&period; मान्यता है कि मां काली ने उनसे अपनी पूजा करने और खप्पड़ पूजा निकालने का निर्देश दिया था&period; कहा जाता है कि मां ने बताया कि खप्पड़ में प्रज्वलित अग्नि के साथ नगर परिक्रमा करने से महामारी का प्रकोप समाप्त होगा।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>लोगों की जान बचाने के लिए झमेली बाबा ने मां की आज्ञा का पालन करते हुए पहली बार माता की डाली खप्पड़ पूजा निकाली&period; स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसके बाद धीरे-धीरे महामारी का प्रकोप समाप्त हो गया और लोग स्वस्थ होने लगे&period; तभी से माता की डाली खप्पड़ पूजा की यह परंपरा लगातार चली आ रही है&period; बताया जाता है कि सन 1818 से शुरू हुई यह परंपरा आज 209वें वर्ष में भी उसी श्रद्धा&comma; विश्वास और आस्था के साथ निभाई जा रही है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>हिंदू-मुस्लिम मिलकर करते हैं ऐतिहासिक पूजा का आयोजन<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>फुलवारी शरीफ की इस ऐतिहासिक खप्पड़ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारा है&period; पूजा के सफल आयोजन में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के बुद्धिजीवी&comma; सामाजिक कार्यकर्ता&comma; नेता&comma; जनप्रतिनिधि और स्थानीय लोग मिलकर अपनी भूमिका निभाते हैं&period; दो सौ साल से अधिक पुरानी इस परंपरा को शांति और सद्भाव के साथ संपन्न कराने में सभी की सहभागिता महत्वपूर्ण मानी जाती है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>पूजा के दौरान सुरक्षा के भी अभूतपूर्व इंतजाम किए गए थे&period; चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी&period; रैपिड एक्शन फोर्स&comma; बिहार सैन्य पुलिस और जिला पुलिस के जवानों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस पदाधिकारी सुरक्षा व्यवस्था में तैनात रहे&period; जिलाधिकारी&comma; वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक&comma; कई नगर पुलिस अधीक्षक&comma; कई पुलिस उपाधीक्षक और आसपास के तमाम थानों के थानाध्यक्षों की निगरानी में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया गया था।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पूजा शुरू होने से पहले बदला गया यातायात का रूट-<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>माता की डाली खप्पड़ पूजा और नगर परिक्रमा के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए यातायात व्यवस्था में भी विशेष बदलाव किया गया था&period; पूजा और परिक्रमा शुरू होने से पहले ही पटना की ओर आने-जाने वाले वाहनों को एहतियातन करीब दो किलोमीटर पहले रोक दिया गया और कई वाहनों का रूट डायवर्ट किया गया&period; पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी के कारण हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बावजूद पूजा और नगर परिक्रमा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>रविवार को एक बार फिर फुलवारी शरीफ ने आस्था&comma; परंपरा और सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत दृश्य देखा&period; आगे-आगे खप्पड़ में हवन की प्रज्वलित अग्नि लिए दौड़ते पुजारी और उनके पीछे हजारों श्रद्धालुओं का उमड़ता आस्था का सैलाब&comma; हाथों में पारंपरिक हथियार और चारों ओर गूंजते जय काली और जय माता दी के जयकारों ने पूरे इलाके को भक्तिमय बना दिया&period; 209वें वर्ष की यह ऐतिहासिक माता की डाली खप्पड़ पूजा फुलवारी शरीफ की सदियों पुरानी आस्था और गौरवशाली परंपरा का एक बार फिर जीवंत उदाहरण बनी।<&sol;p>&NewLine;

Related posts

फाइलेरिया से लड़ते-लड़ते जागा गांव, अब दूसरी बीमारियों को मिटाने में भी समुदाय बनेगा साथी

शिक्षक संवाद में “शिक्षक सेना” के गठन का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित

पटना विमेंस कॉलेज में सावन पर मेहंदी प्रतियोगिता, 105 छात्राओं ने लिया हिस्सा